सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1131 · Raag Bhairao · Guru Amar Daas Ji

1जो व्यक्ति प्रभु का नाम मन में बसा लेता है, उसे नाम द्वारा ही कीर्ति प्राप्त होती है॥२॥

2सतगुरु से भेंट हो जाए तो फल प्राप्त होता है और सत्कर्म ही सुखाधार है।

3वही व्यक्ति निर्मल है, जो प्रभु की भक्ति में लगता है और हरिनाम से प्रेम करता है।॥३॥

4जिन्होंने पूर्ण सतगुरु का ध्यान किया है, उनकी चरणरज मिल जाए तो माथे पर लगा लूं।

5नानक का कथन है कि उनकी चरणरज पूर्ण भाग्य से ही प्राप्त होती है, जिन्होंने राम नाम में मन लगाया है॥४॥३॥ १३॥

6भैरउ महला ३॥

7शब्द-ब्रह्म का चिंतन करने वाला ही सच्वा पुरुष है और उसके ही हृदय में सच्चा परमेश्वर है।

8वह दिन-रात सच्ची भक्ति करता है, जिसके फलस्वरूप तन दुखी नहीं होता॥१॥

9हर कोई भक्ति की चर्चा करता है,

10मगर सतगुरु की सेवा बिना भक्ति प्राप्त नहीं होती और पूर्ण भाग्य से ही प्रभु मिलता है।॥१॥ रहाउ॥

11स्वेच्छाचारी मूलधन तो गंवा देता है पर लाभ की मांग करता है, फिर लाभ कैसे प्राप्त हो सकता है।

12यमकाल उसके सिर पर बना रहता है और वह द्वैतभाव में प्रतिष्ठा खो देता है॥२॥

13वह दिन-रात वेष बदलता है, पर उसका अहम् रोग दूर नहीं होता।

14विद्या पाकर उलझता है, वाद-विवाद एवं व्याख्या करता है और माया में रत होकर सुरति गंवा देता है॥३॥

15सतगुरु की सेवा से ही जीव परमगति पाता है और प्रभु नाम से ही उसे बड़ाई मिलती है।

16नानक का कथन है कि जिसके मन में परमेश्वर का नाम बस जाता है, वही सच्चे द्वार पर प्रतिष्ठा पाता है॥४॥ ४॥ १४॥

17भैरउ महला ३॥

18स्वेच्छाचारी मनुष्य की आशा खत्म नहीं होती और वह द्वैतभाव में ख्वार होता है।

19उसका पेट नदी की तरह कभी नहीं भरता और वह तृष्णा अग्नि में दुःख पाता है।॥१॥

20ईश्वर के रंग में रत रहने वाले सदा आनंद पाते हैं,

21उनके हृदय में नाम के फलस्वरूप मन की दुविधा दूर हो जाती है और वे हरिनामामृत पीकर तृप्त रहते हैं।॥१॥ रहाउ॥

22परब्रह्म ने स्वयं ही सृष्टि बनाकर जीवों को कायों में लगाया है और

23माया का मोह बना कर स्वयं द्वैतभाव में लगा दिया है॥२॥

24हे स्रष्टा ! यदि कोई दूसरा हो तो उसे कहा जाए, पर सब जीव तुझ में ही समाए हुए हैं।

25गुरु से ज्ञान तत्व का चिंतन कर आत्म-ज्योति परम-ज्योति में समाहित हो जाती है।॥३॥

26सो वह प्रभु शाश्वत है, सदैव सच्चा है और उसकी सृष्टि रचना भी सच्ची है।

27नानक का कथन है कि सतगुरु से सूझ पाकर सच्चे नाम से जीव की मुक्ति हो जाती है।॥४॥५॥ १५॥

28भैरउ महला ३॥

29जिसने राम को नहीं पहचाना, वह कलियुग में प्रेत समान है। परम सत्य का चिन्तनशील सतयुग का परमहंस है।

30द्वापर एवं त्रेता में विरले ही मनुष्य हुए हैं, जिन्होंने अहम्-भाव को मिटाया है॥१॥

31कलियुग में राम नाम के संकीर्तन से ही बड़ाई है।

32युग-युगांतर गुरु ने एक परम सत्य परमेश्वर को ही माना है और प्रभु-नाम बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती॥१॥ रहाउ॥

33जो व्यक्ति हृदय में ही प्रभु-नाम को देखता है, वही सत्यनिष्ठ है और ऐसे गुरमुख ने उसे मन में बसाया है।

34जिसने राम नाम में लगन लगाई है, वह स्वयं तो पार हुआ है, साथ ही समूची वंशावलि को भी पार करवा दिया है॥२॥

35मेरा प्रभु गुणों का दाता है, शब्द द्वारा वह सब अवगुण जला देता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं