सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1130 · Raag Bhairao · Guru Amar Daas Ji

1सतगुरु से ज्ञान अंजन प्राप्त होता है कि

2तीनों लोकों में राम नाम ही व्याप्त है॥३॥

3कलियुग में केवल ईश्वर के भजन-संकीर्तन का ही समय है, अन्य कोई उचित समय नहीं।

4नानक फुरमाते हैं कि हे भक्तजनो ! गुरु के सान्निध्य में राम नाम हृदय में अवस्थित कर लो॥४॥ १०॥

5भैरउ महला ३ घरु २

6ੴ सतिगुर प्रसादि॥

7स्वेच्छाचारी को दुविधा का रोग लगा रहता है और वह अधिकतर तृष्णा की अग्नि में जलता है।

8वह पुनः पुनः जन्मता-मरता है, कोई ठौर-ठिकाना नहीं पाता और अपना जन्म निरर्थक गंवा देता है॥१॥

9मेरे प्रियतम ने कृपा कर समझा दिया है कि

10अहम् रोग में जगत उत्पन्न हुआ है और शब्द के बिना रोग निवृत्त नहीं होता।॥१॥ रहाउ॥

11मुनियों ने शास्त्रों एवं स्मृतियों का पठन किया लेकिन शब्द के बिना उन्हें सुरति प्राप्त नहीं हुई।

12माया के तीन गुणों के कारण सब रोगी हो गए और ममत्व के कारण सुरति गंवा दी॥२॥

13मगर किसी को प्रभु ने स्वयं ही रोग से बचा लिया और गुरु की सेवा में तल्लीन कर दिया।

14फिर उसने हरिनाम रूपी सुखों का भण्डार पा लिया और उसके मन में सुख आकर बस गया॥३॥

15गुरु के सान्निध्य में उसे तुरीयावस्था प्राप्त हुई और उसने सच्चे घर में वास पा लिया।

16पूरे सतगुरु ने कृपा कर अन्तर्मन से अहम् भावना निवृत्त कर दी॥४॥

17जिसने ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव को उत्पन्न किया है, उस एक ईश्वर की सम्पूर्ण सृष्टि पर सत्ता है।

18नानक का कथन है कि एक सत्यस्वरूप परमेश्वर ही निश्चल है और जन्म-मरण से रहित है॥५॥१॥ ११॥

19भैरउ महला ३॥

20मनमुखी जीव सदा दुविधा का रोगी बना रहता है, इस तरह समूचा संसार ही इस रोग का शिकार है।

21गुरु के सान्निध्य में रहने वाला इस तथ्य को बूझकर रोग निवृत कर देता है और शब्द-गुरु का चिंतन करता है॥१॥

22ईश्वर ही संतों की संगत में मिलाता है।

23हे नानक ! जो राम नाम में ध्यान लगाता है, उसे ही कीर्ति प्रदान करता है॥ १॥ रहाउ॥

24ममत्व में लीन रहने से काल एवं सभी रोग सताते हैं और उन पर यम की पीड़ा बनी रहती है।

25जिसने परमात्मा को अपने मन में बसा लिया है, उस गुरमुख प्राणी के निकट यम भी नहीं आता॥२॥

26जिसने गुरु के सान्निध्य में हरिनाम को नहीं समझा, वह जगत में क्यों आया है।

27गुरु की सेवा कभी की नहीं, अपना जन्म व्यर्थ ही गंवा दिया॥३॥

28नानक का कथन है कि वही पूर्ण भाग्यशाली हैं, जो सतगुरु की सेवा में तल्लीन रहते हैं,

29जैसी कामना करते हैं, वैसा ही फल प्राप्त करते हैं और गुरु की वाणी से सुख पाते हैं।॥४॥२॥ १२॥

30भैरउ महला ३॥

31(मनमर्जी करने वाला) मनुष्य दुख में जन्म लेता है, दुख में ही मृत्यु को प्राप्त होता है और दुखों में ही कामकाज करता है।

32वह गर्भ योनि में से कभी मुक्त नहीं होता और विष्ठा में ही पड़ा रहता है॥१॥

33इस प्रकार के मनमुख मनुष्य को धिक्कार है, अपना जीवन उसने व्यर्थ ही गंवा दिया है।

34पूरे गुरु की कभी न सेवा की और न ही परमात्मा का नाम उसे अच्छा लगा॥१॥रहाउ॥

35जिसे ईश्वर लगन में लगाता है, गुरु का शब्द उसके सब रोग दूर कर देता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं