सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 112 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1वह दिन-रात तृष्णाग्नि में जलती रहती है और पति-प्रभु के बिना बहुत दुखी रहती है॥२ ॥

2मनुष्य का शरीर एवं जाति परलोक में नहीं जाते।

3जहाँ कर्मों का लेखा तलब किया जाता है, वहाँ सत्य की कमाई द्वारा ही वह मोक्ष को प्राप्त होगा।

4जो सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, वह धनवान हैं। वह लोक तथा परलोक में हरिनाम में विलीन रहते हैं॥३॥

5जो जीव-स्त्री प्रभु के भय एवं प्रेम को अपना हार-श्रृंगार बनाती है,

6वह गुरु की दया से अपने घर में ही उसकी उपस्थिति को पा लेती है।

7वह दिन-रात हमेशा उपने प्रियतम के साथ रमण करती है और मजीठ जैसे पक्की रंगत निश्चित कर लेती है॥४॥

8समस्त जीव-स्त्रियों का प्रियतम प्रभु हमेशा ही सभी के साथ रहता है।

9गुरु की दया से कोई विरला ही अपने नेत्रों से उसके दर्शन करता है।

10मेरा प्रभु सर्वश्रेष्ठ है। वह अपनी कृपा करके स्वयं ही जीव-स्त्री को अपने साथ मिला लेता है॥ ५॥

11यह जगत् मोह-माया में फँसकर अज्ञानता की निद्रा में सोया हुआ है।

12प्रभु के नाम को विस्मृत करके यह अंतः नष्ट हो जाता है।

13जिस परमात्मा के हुक्म से यह जगत् निद्रामग्न है, वही इसे ज्ञान प्रदान करके जगाता है। गुरु के उपदेश द्वारा इसको सूझ प्राप्त होती है॥६॥

14जो व्यक्ति नाम रूपी अमृत पान करता है, वह अपना भ्रम निवृत्त कर देता है।

15गुरु की दया से वह मोक्ष की पदवी को प्राप्त कर लेता है।

16जो परमेश्वर की भक्ति में मग्न रहता है, वह सदैव ही निर्लेप है। अपने अंह को मारकर वह अपने प्रभु को मिल जाता है।॥७॥

17हे ईश्वर ! तूने स्वयं ही सृष्टि की रचना करके प्राणी उत्पन्न किए हैं और अपने-अपने कर्म में लगा दिया है।

18हे प्रभु ! चौरासी लाख योनियों को स्वयं ही तुम जीविका पहुँचाते हो।

19हे नानक ! जो व्यक्ति प्रभु का नाम-सिमरन करते रहते हैं, वे सत्य प्रभु के प्रेम में मग्न रहते हैं। वह वहीं कार्य करते हैं, जो प्रभु को अच्छा लगता है ॥८॥४॥५॥

20माझ महला ३ ॥

21भगवान ने आत्मस्वरूप में हीरे एवं लाल जैसा अमूल्य नाम रखा हुआ है।

22गुरु के शब्द द्वारा इसकी परख की तथा करवाई जाती है।

23जिनके पास सत्यनाम है, वह सत्य-नाम का ही बखान करते हैं तथा इसकी परख करने के लिए सत्यनाम की ही कसौटी लगानी पड़ती है॥१॥

24जिन्होंने गुरु की वाणी को अपने मन में बसा लिया है, मैं उन पर तन-मन से न्योछावर हूँ।

25वह माया के अंजन में ही निरंजन प्रभु को पा लेते हैं। वह अपनी ज्योति को प्रभु की परम-ज्योति में मिला देते हैं॥१॥ रहाउ॥

26जैसे ब्रह्माण्ड में परमात्मा ने अपना प्रसार किया हुआ है, वैसे ही उसने मनुष्य की काया में अपना अत्यधिक प्रसार किया हुआ है।

27प्रभु का निरंजन नाम अत्यंत अगम्य एवं अपरंपार है।

28जो व्यक्ति गुरु के सान्निध्य में रहता है, इस नाम की लब्धि उसे ही हो सकती है। प्रभु गुरमुख व्यक्ति को क्षमा करके स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥२॥

29मेरा ठाकुर प्रभु जिस व्यक्ति के हृदय में सत्य नाम बसा देता है

30और गुरु की कृपा से वह सत्य में ही अपना चित्त लगाता है।

31सत्य का पुंज परमेश्वर स्वयं ही सर्वव्यापक है। वह मनुष्य सत्य प्रभु में ही लीन रहता है॥३॥

32मेरा प्रिय प्रभु सदैव सत्य एवं बेपरवाह है।

33वह जीवों के पापों एवं अवगुणों को नाश करने वाला है।

34अतः प्रेमपूर्वक सदैव ही उसका सिमरन करते रहना चाहिए। उसका भय मानते हुए प्रेमपूर्वक उसकी भक्ति को अपने हृदय में बसाना चाहिए॥४॥

35हे भगवान ! तेरी भक्ति सदैव सत्य है और इसकी देन जीव को तेरी इच्छानुसार ही मिलती है।

36तू स्वयं ही अपनी भक्ति की देन प्रदान करता है परन्तु देन देकर तू पश्चाताप नहीं करता।

37समस्त जीव-जन्तुओं का दाता एक प्रभु ही है। वह नाम द्वारा जीवों के अहंकार को नष्ट करके उन्हें सत्य जीवन प्रदान करने वाला है॥ ५॥

38हे भगवान ! तेरे सिवाय मेरा अन्य कोई नहीं।

39में तेरी ही भक्ति करता हूँ और तेरी ही महिमा-स्तुति करता हूँ।

40हे सत्य परमेश्वर ! आप ही मुझे अपने साथ मिला लो। तेरी पूर्ण कृपा से ही तुझे पाया जा सकता है॥ ६॥

41हे भगवान ! मुझे तेरे जैसा अन्य कोई नजर नहींआता।

42तेरी कृपा-दृष्टि से मेरा शरीर सफल हो सकता है।

43भगवान प्रतिदिन जीवों की देखरेख करके उनकी रक्षा करता है। अतः गुरमुख सहज ही प्रभु में लीन रहते हैं। ७॥

44हे भगवान ! तेरे जैसा महान मुझे अन्य कोई भी नहीं दिखता।

45तू स्वयं ही सृष्टि की रचना करता है और स्वयं ही इसका विनाश करता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं