गुरु ग्रंथ साहिब 1128 · Raag Bhairao · Guru Amar Daas Ji
1इस गर्व के कारण अनेक विकारों में वृद्धि होती है॥१॥ रहाउ॥
2हर कोई कहता है कि (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) चार वर्ण हैं,
3मगर समूचे संसार की उत्पति एक ब्रह्म बिंदु से हुई है (अर्थात् सब एक पिता परमेश्वर की औलाद हैं)॥२॥
4समूचे संसार की रचना में एक ही मिट्टी का प्रयोग हुआ है,
5इसी से ईश्वर रूपी कुम्हार ने अनेक प्रकार के जीव रूपी बर्तन बनाए हैं॥३॥
6पंचतत्व मिलाकर शरीर का आकार बना है,
7फिर किसी में कम या अधिक तत्व कैसे कोई कह सकता है॥४॥
8नानक कहते हैं कि यह जीव कर्मों के बन्धन में बंधा हुआ है और
9सतगुरु से साक्षात्कार किए बिना इसकी मुक्ति नहीं होती॥५॥१॥
10भैरउ महला ३॥
11योगी, गृहस्थी, पण्डित, वेषाडम्बरी
12सब अपने अहंकार के कारण अज्ञान की निद्रा में सो रहे हैं।॥१॥
13जीव माया के मद में मस्त रहता है,
14पर जो जागृत रहता है, उसे कोई नहीं लूटता॥१॥रहाउ॥
15वही जागृत रहता है, जिसका सतगुरु से साक्षात्कार हो जाता है,
16वह कामादिक पाँच दूतों को वशीभूत कर लेता है॥२॥
17वही जागता है, जो तत्व का चिंतन करता है,
18वह अन्यों को नहीं मारता अपितु अपने अहम् को मारता है॥३॥
19वही जागता है, जो ईश्वर को जानता है।
20वह मनोवृति छोड़कर सार तत्व को पहचान लेता है॥४॥
21चारों वर्णो में जो कोई जागता है,
22वही यमकाल से छूट जाता है॥५॥
23नानक कहते हैं कि वही व्यक्ति जागृत है,
24जिसकी आँखों में ज्ञान-अंजन होता है॥६॥२॥
25भैरउ महला ३॥
26जिसे परमेश्वर अपनी शरण में रखता है,
27वह सत्य में प्रवृत्त होकर सच्चा फल हो पाता है॥१॥
28हे मनुष्य ! किस के आगे पुकार कर रहे हो,
29सब उसके हुक्म से पैदा हुआ है और हुक्म से चल रहा है॥१॥रहाउ॥
30हे ईश्वर ! यह संसार तेरा धारण किया हुआ है और
31इसे तुम क्षण में नष्ट कर देते हो और कोई समय नहीं लगता॥२॥
32ईश्वर ने कृपा कर एक विचित्र खेल दिखाया है,
33गुरु की कृपा हो जाए तो मोक्ष पाया जा सकता है।॥३॥
34नानक कहते हैं कि दरअसल मारने-जिंदा करने वाला ईश्वर ही है,
35इस सच्चाई को समझ लो, भ्रम में पड़कर मत भूलो॥४॥३॥
36भैरउ महला ३॥
37ईश्वर मेरा पति है, मैं उसकी पत्नी हूँ।
38जैसा वह चाहता है, वैसा ही मैं श्रृंगार करती हूँ॥१॥
39जब उसकी रज़ा होती है तो मुझसे रमण करता है।
40यह तन मन उस सच्चे मालिक योग्य है॥१॥ रहाउ॥
41कोई उसकी प्रशंसा एवं निंदा क्या करे,
42जब वह स्वयं ही सबमें व्याप्त है॥२॥
43गुरु की कृपा से प्रियतम की ओर आकर्षित हुई हूँ और
44खुशियों के नाद बजाकर दयालु प्रभु से मिल जाऊँगी।॥३॥
45गुरु नानक कहते हैं कि कोई क्या कर सकता है,
46जिसे वह स्वयं ही मिला लेता है॥४॥ ४॥
47भैरउ महला ३॥
48मुनि वही है, जो मन की दुविधा को मारता है और
49दुविधा को मारकर ब्रह्म का चिंतन करता है॥१॥
50हे भाई ! इस मन को कोई खोज लो,
51मन को खोजने से नाम रूपी नवनिधि प्राप्त होती है॥ १॥ रहाउ॥
52मोह का तत्व डालकर परमपिता ने जगत को उत्पन्न किया और
53ममत्व की भावना में लगाकर उसे भ्रम में भुला दिया है॥२॥
54इस मन से सब शरीर एवं प्राण हैं और
55मन के चिंतन द्वारा ईश्वर के हुक्म को बूझकर उसमें समाया जा सकता है॥३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं