गुरु ग्रंथ साहिब 1127 · Raag Bhairao · Guru Nanak Dev Ji
1सत्य में लीन सेवक की जिहा पर सत्य रूपी अमृत ही होता है और झूठ की मैल उसे बिल्कुल नहीं लगती।
2उसने निर्मल नामामृत का ही रस चखा है और शब्द में रत रहकर शोभा प्राप्त की है॥३॥
3गुणवान व्यक्ति पूर्ण गुणवान संत गुरु से साक्षात्कार कर लाभ ही पाता है और गुरुमुख बनकर प्रभु-नाम का संकीर्तन कर शोभा पाता है।
4गुरु नानक का फुरमान है कि गुरु की सेवा करने से सब दुख मिट जाते हैं और हरिनाम उसका सहायक होता है।॥४॥५॥६॥
5भैरउ महला १॥
6गुरु की कृपा से हृदय में सर्वोच्च धन प्रभु-नाम प्राप्त होता है।
7सहज-स्वभाव ध्यान लगाकर प्रभु में लगन लगाने से अमर पदार्थ से जीव कृतार्थ हो जाता है।॥१॥
8हे मन ! ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाओ।
9गुरुमुख बनकर हृदय में राम नाम का जाप करने से सहज ही वास्तविक घर में जाया जा सकता है॥१॥ रहाउ॥
10भ्रम, भेदभाव व भय कभी छूट नहीं सका और न ही संसार में आने-जाने के रहस्य को समझा।
11वास्तव में हरिनाम बिना कोई भी मुक्ति नहीं पा सकता और नामविहीन बिन पानी ही डूब मरे हैं।॥२॥
12सांसारिक काम करते हुए जीव अपनी इज्जत खो देता है, फिर भी गंवार जीव का भ्रम नहीं मिटता।
13शब्द-गुरु के बिना कभी मुक्ति नहीं मिलती, अंधे जीव ने केवल धंधों का प्रसार किया हुआ है।॥३॥
14जब मायातीत परमेश्वर से मन मानता है तो मन से ही मन के विकार समाप्त हो जाते हैं।
15नानक का कथन है केि अन्तर-बाहर सबमें ईश्वर को ही माना है, उसके सिवा किसी अन्य के प्रति कोई रुचि नहीं॥४॥६॥ ७॥
16भैरउ महला १॥
17यज्ञ, होम, दान-पुण्य, तपस्या व पूजा इत्यादि में प्रवृत्त होकर शरीर दुखी होता है और नित्य ही दुख सहता है।
18राम-नाम बिना जीव को मुक्ति प्राप्त नहीं होती और संसार से मुक्ति देने वाला नाम गुरु से ही मिलता है।॥१॥
19राम-नाम के बिना जगत में जन्म लेना व्यर्थ है,
20जीव विकार रूपी जहर खाता है, जहर भरी बोली बोलता है और प्रभु-नाम बिना निष्फल मरकर भटकता रहता है।॥१॥ रहाउ॥
21कोई पुस्तकों का पाठ व व्याकरण की व्याख्या करता है, सुबह, दोपहर एवं शाम को संध्या-वन्दन करता है,
22मगर शब्द-गुरु के बिना ऐसा प्राणी मुक्ति कैसे पा सकता है, राम-नाम के बिना वह अनेक कार्यों में उलझकर मरता है॥२॥
23अगर कोई डंडा, कमण्डल, शिखा, जनेऊ, धोती धारण कर अनेक बार तीर्थों पर भी भ्रमण कर ले,
24मगर राम-नाम बिना उसके मन को शान्ति प्राप्त नहीं होती। जो ईश्वर का नाम जपता है, वह संसार-सागर से पार उतर जाता है॥३॥
25अगर योगी बनकर जटाओं का मुकुट बना लिया, शरीर पर भस्म लगा ली और वस्त्र छोड़कर शरीर नग्न हो गया,
26फिर भी राम-नाम बिना तृप्ति नहीं मिलती, यह तो कर्माफल के रूप में वेष बना हुआ है॥४॥
27हे ईश्वर ! जल, थल, नभ में जितने भी जीव-जन्तु हैं, जहाँ कहाँ तू सबमें व्याप्त है।
28नानक की विनती है कि गुरु कृपा से दास को बचा ले, उसने हरि-नाम रस ही पान किया॥५॥७॥८॥
29रागु भैरउ महला ३ चउपदे घरु १
30ੴ सतिगुर प्रसादि॥
31हे सज्जनो, जाति का कोई गर्व न करो,
32जो ब्रह्म को मानता है, असल में वही ब्राह्मण होता है॥१॥
33हे मूर्ख-गंवार ! जाति का गर्व मत कर,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं