गुरु ग्रंथ साहिब 1126 · Raag Bhairao · Guru Nanak Dev Ji
1सच्चे शब्द के बिना कभी छुटकारा नहीं हो सकता, यह मनुष्य जन्म निरर्थक जा रहा है॥१॥ रहाउ॥
2शरीर में काम, क्रोध, अहम् व ममत्व अत्यंत भारी दर्द प्रदान करते हैं।
3गुरु के माध्यम से आनंदपूर्वक जिह्म से ईश्वर का भजन करो; इस तरीके से संसार-सागर को पार किया जा सकता है॥२॥
4कान बहरे हो गए हैं, बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है, शब्द के भेद को बूझा नहीं।
5इस तरह मनमुखी जीव ने अमूल्य जन्म हार दिया है और गुरु के बिना अज्ञानांध जीव को कोई सूझ प्राप्त नहीं होती॥३॥
6अगर जीवन की आशाओं को छोड़कर निर्लिप्त हुआ जाए और वैराग्यवान होकर सहज स्वाभाविक ईश्वर में ध्यान लगा रहे,
7गुरु नानक का फुरमान है कि गुरु के सान्निध्य में राम नाम में लगन लगाने से संसार के बन्धनों से छुटकारा हो जाता है॥४॥२॥३॥
8भैरउ महला १॥
9चाल खराब एवं हाथ-पैर शिथिल हो गए हैं, शरीर की त्वचा भी कुम्हला चुकी है।
10ऑखों से धुंधला दिखाई देने लग गया है, कान भी बहरे हो गए हैं, मगर मनमुखी जीव ने प्रभु-नाम की महत्ता को नहीं जाना॥१॥
11अरे अन्धे ! जगत में आकर तूने क्या पाया है,
12राम की स्मृति हृदय में नहीं, न ही गुरु की सेवा की, तू अपना मूल गंवाकर भी चलता बन रहा है॥१॥ रहाउ॥
13तेरी जिव्हा प्रभु के रंग में लीन नहीं हुई, जब भी बोले, तब फीका ही बोले।
14संतजनों की निंदा करते तुम पशु ही बन गए हो, मगर कभी भले न बन सके॥२॥
15सतगुरु के संपर्क में हरिनाम-अमृत का रस किसी विरले ने ही पाया है।
16जब तक शब्द का भेद ज्ञात नहीं होता, तब तक जीव को काल तंग करता रहता है॥३॥
17जिसने अन्य घर-द्वार (अर्थात् देवी-देवताओं) को कभी न मानते हुए एक परमेश्वर पर ही अटूट श्रद्धा धारण की है, वही सत्यनिष्ठ है।
18नानक विचार कर कहते हैं कि गुरु की कृपा से उसे परमपद प्राप्त हो गया है॥४॥३॥४॥
19भैरउ महला १॥
20सारी रात परेशानियों का गले में फदा डालकर सोते रहे और दिन जंजाल में गंवा दिया।
21जिसने यह जगत उत्पन्न किया है, उस प्रभु का तुमने क्षण, पल, घड़ी स्मरण ही नहीं किया॥१॥
22हे मन, फिर भारी दुखों से तेरा कैसे छुटकारा हो सकता है।
23तू क्या लेकर आया था और क्या लेकर चला जाएगा, राम का भजन कर ले, यही लाभप्रद है॥ १॥ रहाउ॥
24स्वेच्छाचारी का हृदय कमल औधा पड़ा है, बुद्धि भी ओच्छी हो गई है, मन अन्धा बनकर संसार के धंधों में लिप्त है।
25विकराल काल सदा तेरे सिर पर खड़ा है और हरिनाम बिना गले में फन्दा ही पड़ता है॥२॥
26तेरी चाल विकृत हो गई है, आँखें भी अन्धी हो चुकी हैं मगर सुरति को शब्द अच्छा नहीं लगा।
27शास्त्र, वेद, तीन गुण मायावी हैं, मगर जीव अन्धा बनकर जगत के धंधों में लिप्त है॥३॥
28हे दुर्मति ज्ञानविहीन ! मूलधन तो खो दिया है, फिर लाभ कैसे प्राप्त हो सकता है।
29गुरु नानक का मत है कि जिसने शब्द का गहन चिंतन कर राम रस को चखा है, वह सत्य से प्रसन्न हो गया।॥४॥४॥५॥
30भैरउ महला १॥
31जो दिन-रात गुरु की संगत में रहता है, जिसकी जिव्हा राम के रंग में लीन रहती है,
32वह प्रभु-शब्द में निष्ठा रखकर किसी अन्य को नहीं मानता और अन्तर्मन में परम-सत्य को पहचान लेता है॥१॥
33सो ऐसा सज्जन ही मेरे मन को भाता है,
34वह अहम् को मारकरं प्रभु में लीन रहता है और गुरु की सेवा करता रहता है।॥१॥ रहाउ॥
35अन्तर-बाहर सबमें परमपुरुष परमेश्वर ही व्याप्त है और उस आदिपुरुष को हमारा शत्-शत् प्रणाम है।
36वह सत्यस्वरूप घट-घट सबमें रमण कर रहा है॥२॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं