सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1122 · Raag Kaydaaraa · Guru Arjan Dev Ji

1मन में हरिनाम की चाहत बनी हो तो

2करोड़ों सुख-शान्तियों एवं पूर्ण आनंद की प्राप्ति होती है तथा दिल की जलन बुझ जाती है।॥ रहाउ॥

3संतों के मार्ग चलने पर पतित प्राणियों का उद्धार हो गया है,

4(अगर) संतजनों की चरणरज मस्तक पर लग गई तो अनेकों तीर्थ स्नान की शुद्धता का फल मिल जाता है।॥ १॥

5मन में प्रभु-चरणों का ही ध्यान है और घट-घट में वह स्वामी व्याप्त है।

6नानक का कथन है कि देवाधिदेव प्रभु की शरण में आने से यम दोबारा दुखी नहीं करते॥ २॥ ७॥ १५॥

7केदारा छंत महला ५

8वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

9हे मेरे प्रियतम, प्यारे प्रभु ! मुझे आ मिलो॥ रहाउ॥

10वह आदिपुरुष विधाता सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है।

11प्रभु को पाने का मार्ग उसने स्वयं ही बनाया है और संतजनों की संगत में ही वह जाना जाता है।

12संतजनों के संग ही परमपुरुष विधाता ज्ञात होता है और घट-घट में वही दिखाई देता है।

13जो शरण में आता है, वह सर्व सुख पाता है और उसकी सेवा निष्फल नहीं होती।

14जिसने सहज-स्वभाव ईश्वर के गुण गाए हैं, वह प्रेम रूपी महारस में ही मस्त रहता है।

15हे परमेश्वर ! दास नानक तेरी शरण में है, केवल तू ही पूर्ण परमपुरुष विधाता है॥ १॥

16भक्त तो प्रभु की प्रेम-भक्ति से बिंध गया है, फिर अन्य कहीं जा सकता है।

17जिस प्रकार मछली वियोग सह नहीं पाती और जल बिना मर ही जाती है,

18वैसे ही प्रभु बिना क्योंकर रहा जा सकता है, दुख कैसे सहा जा सकता है, पपीहा बिन बूंद प्यासा ही मर जाता है।

19कब रात्रि व्यतीत होगी, चकवी को सूर्य-किरणों का उजाला होने से परम सुख प्राप्त होता है।

20मन प्रभु-दर्शन की लालसा में लीन है, वह दिन खुशनसीब है, जब रात-दिन ईश्वर का ही गुणानुवाद किया है।

21दास नानक विनती करते हैं कि प्रभु बिन प्राण कैसे टिक सकते हैं।॥२॥

22जैसे श्वास बिना शरीर को शोभा प्राप्त नहीं होती,

23वैसे ही दर्शन विहीन साधुजन पल भर टिक नहीं पाते।

24मन प्रभु-चरणों में ही बिंधा हुआ है, अतः प्रभु बिना रहना तो नरक भोगना है।

25वैराग्यवान एवं प्रभु का रसिया, जिसकी नाम में लगन लगी रहती है, उसका तिरस्कार नहीं किया जा सकता।

26ईश्वर से मिलना, साधु-पुरुषों की संगत में रहने का सच्चा सुख अन्तर में समाया नहीं जा सकता।

27हे नानक के स्वामी ! कृपालु हो जाओ ताकि तेरे चरणों में लीन रहूँ॥ ३॥

28खोजते-खोजते करुणामय प्रभु से साक्षात्कार हुआ है।

29मैं गुणविहीन, नीच व अनाथ हूँ, पर उसने मेरे दोषों की ओर ध्यान नहीं दिया।

30उसने दोषों की ओर ध्यान न देकर भी सब सुख प्रदान किए हैं और पावन करना उसका धर्म-स्वभाव माना जाता है।

31यह सुनकर कि वह अपने भक्तों को प्यार करता है, मैंने आँचल को पकड़ लिया है। वह पूरी तरह से हर दिल में प्रवेश कर रहा है।

32मैंने सहज-स्वभाव सुख-सागर परमेश्वर को पा लिया है, जिससे जन्म-मरण का दुख निवृत्त हो गया है।

33नानक का कथन है कि प्रभु ने हाथ थमाकर दास को अपने साथ मिला लिया है, उसने हृदय में राम-नाम की माला धारण कर ली है॥ ४॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं