गुरु ग्रंथ साहिब 1121 · Raag Kaydaaraa · Guru Arjan Dev Ji
1वैसे ही जिव्हा प्रभु के गुणों का उच्चारण करने में लगी हुई है॥ १॥
2जैसे मधुर संगीत की धुन से मोहित होकर मृग तीरों से बिंध जाता है,
3वैसे ही नानक ने प्रभु चरण-कमल के रस से गांठ बाँध ली हैI॥ २॥ १॥ ९॥
4केदारा महला ५॥
5हे प्रियतम ! मेरे हृदय में अवगुण बस रहे हैं,
6हे मालिक ! भ्रम की दीवार गिराकर अपनी ओर झुका लो॥१॥ रहाउ॥
7संसार-सागर में बहुत गर्त है, दया कर पार करवा दो।
8संतों के संग हरि-चरणों के जहाज़ द्वारा मेरा उद्धार कर लो॥ १॥
9जिसने गर्भ कुण्ड में से बचाया है, विषय-विकारों में भी अन्य कोई नहीं बचाने वाला।
10नानक निष्ठापूर्वक मानते हुए कहते हैं कि परमेश्वर की शरण अति प्रबल एवं समर्थ है और उसके सिवा किसी अन्य का कोई सहारा नहीं॥ २॥ २॥ १०॥
11केदारा महला ५॥
12हे सज्जनो, जिव्हा से राम नाम का जाप करो,
13हरदम ईश्वर का स्तुतिगान करने से पाप-दोष नष्ट हो जाते हैं।॥ रहाउ॥
14दुनियावी सुख-संपत्ति को निश्चय ही त्याग जाना है; अतः मौत को सिर पर अपरिहार्य मानो।
15मिथ्या मोह एवं बुरी आशा को झूठा ही समझना॥१॥
16सत्यपुरुष अकालमूर्ति परमेश्वर का ह्रदय में ध्यान करो।
17नानक का कथन है कि सुखनिधान हरिनाम वस्तु का लाभ प्राप्त करो, यही मान्य है॥ २॥ ३॥ ११॥
18केदारा महला ५॥
19हरिनाम ही हमारा एकमात्र आसरा है,
20संतों के संग व्यवहार करने से कलह-कलेश बिल्कुल प्रभावित नहीं करते॥ रहाउ॥
21जिसे प्रभु आप कृपा करके बचाता है, उस पर कोई दुःख-विकार प्रभाव नहीं डालता।
22जिसे ईश्वर का सुमिरन प्राप्त हो जाता है, उसे संसार की जलन या पीड़ा तंग नहीं करती॥१॥
23ईश्वर सुखों का कोष एवं आनंदस्रोत है और उसके चरण अमृत समान हैं।
24हे प्रभु ! दास नानक तेरी शरणागत है और तेरे संतजनों की धूल मात्र है।॥ २॥४॥ १२॥
25केदारा महला ५॥
26हरिनाम-संकीर्तन सुने बिना कान धिक्कार योग्य हैं।
27जीवन रूप परमेश्वर को भुलाकर जीने वाले व्यक्तियों का क्या जीना है ?॥ रहाउ॥
28वे अनेक प्रकार के व्यंजन खाते-पीते भी जैसे भार ढोने वाले गधे हैं।
29वे जुते बैल की मानिंद आठ पहर कोल्हू में सख्त मेहनत करते रहते हैं।॥ १॥
30ईश्वर को तजकर जो कर्मकाण्डों में लीन हो जाते हैं, वे बहुत प्रकार से रोते हैं।
31नानक हाथ जोड़कर यही दान माँगता है कि हे प्रभु ! अपने गले से लगाकर रखना॥ २॥५॥ १३॥
32केदारा महला ५॥
33अगर संतजनों की चरणरज मुख पर लगाई जाए,
34सदैव पूर्ण अटल ओंकार का स्तुतिगान किया जाए तो कलियुग के दोष भी नहीं सताते॥ रहाउ॥
35गुरु के वचनानुसार सब कार्य पूर्ण हो जाते हैं और इससे मन इधर-उधर विचलित नहीं होता।
36प्रभु एक ही है, सबमें परिपूर्ण है, उसकी सत्ता को मानने से विकारों की अग्नि नहीं जलाती॥ १॥
37हे ईश्वर ! बांह पकड़कर दास को अपने संग मिला लो और आत्म-ज्योति को परम-ज्योति में मिला लो।
38नानक प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु ! यह अनाथ तेरी चरण-शरण में आया है, अपने संग मिला लो॥ २॥ ६॥ १४॥
39केदारा महला ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं