सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1120 · Raag Kaydaaraa · Guru Arjan Dev Ji

1हे प्रभु ! मैं सदैव तुझ पर बलिहारी जाता हूँ, तेरा अनुपम स्थान कैसा है॥ १॥

2तू सब जीवों का पोषक है, सबकी संभाल करता है और उन्हें तेरा ही आसरा है।

3हे नानक के प्रभु ! हे परमपुरुष विधाता ! मैं घट-घट तुझे ही देखता रहता हूँ।॥ २॥ २॥ ४॥

4केदारा महला ५॥

5प्रिय प्रभु की प्रीति अत्यंत प्यारी है।

6हे प्रभु ! मन में मग्न होकर तेरी आशा लगाए रखता हूँ और नयनों से तुझे देखने की तीव्र लालसा लगी हुई है॥ रहाउ॥

7वे दिन, प्रहर, मुहूर्त, पल एवं घड़ी कैंसी होगी,

8जब तुरंत कपाट खुलकर तृष्णा बुझेगी और दर्शन पाकर जीवन प्राप्त होगा॥ १॥

9गुरु नानक का कथन है कि वह कौन-सा यत्न, कारगर उपाय है, कैसी सेवा एवं कौन-सा विचार है,

10जिससे मान-अभिमान एवं मोह छोड़कर संतों के संग उद्धार हो सकता है॥ २॥३॥५॥

11केदारा महला ५॥

12हर पल ईश्वर की महिमा गान करो।

13हे परमेश्वर ! कृपा करो और अपने नाम का ही जाप करवाओ॥ रहाउ॥

14प्रभु ने अन्य विषय-विकारों से निकाल लिया है, अब साधु-संगत में मन लीन है।

15गुरु के वचन ने भ्रम-भय और मोह काट दिया है, अपने दर्शन करवा दो॥ १॥

16मेरा मन सब की चरणरज बना रहे, अतः मेरी अहम्-बुद्धि नष्ट कर दो।

17नानक का कथन है कि हे दयालु परमेश्वर ! जिसे तू अपनी भक्ति प्रदान करता है, ऐसा भाग्यशाली तुझे पा लेता है॥२॥४॥६॥

18केदारा महला ५॥

19हे जीव ! प्रभु-सिमरन बिना तेरा जीवन व्यर्थ ही जा रहा है।

20ईश्वर की अर्चना को तजकर अन्य रंगों में लीन रहकर तुम्हारा खाना-पहनना भी मात्र झूठा है॥ रहाउ॥

21धन-दौलत, यौवन, संपति इत्यादि सुख भोगते रहते हो परन्तु अन्त में ये साथ नहीं निभाते।

22अरे पगले ! मृगतृष्णा को देख कर उसमें ही तू आसक्त है, ये सब सुख-सुविधाएँ जिनमें तू लीन है, यह तो पेड़ की छाया मानिंद अस्थाई हैं।॥ १॥

23मैं मान-मोह एवं महा मद में मोहित हूँ और काम-क्रोध के गङ्गे में पड़ा हुआ हूँ।

24हे प्रभु जी ! दास नानक को बाँह पकड़ा कर इन से निकालने में सहायता करो॥२॥ ५॥ ७॥

25केदारा महला ५॥

26प्रभु के सिवा कोई भी अंतकाल साथ नहीं निभाता।

27हे दीनानाथ ! तू करुणापति, सबका स्वामी एवं अनाथों का नाथ है॥ रहाउ॥

28पुत्र-सम्पति, विकारों के रस भोग यम के मार्ग पर साथ नहीं निभा पाते ।

29सुखनिधि हरिनाम जपो, उस गोविंद के गुण गाओ, अंततः यही संसार-सागर के गङ्गे से उद्धार करवाता है॥ १॥

30शरण देने वाले, पूर्ण समर्थ, अकथनीय, इन्द्रियातीत परमेश्वर का सिमरन करने से दुःख-दर्द निवृत्त हो जाते हैं।

31नानक दीन संतजनों की चरण-धूल की कामना करता है, पर माथे पर भाग्य हो तो ही यह मिलती है॥ २॥ ६॥ ८॥

32केदारा महला ५ घरु ५

33वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

34मन से ईश्वर कदापि नहीं भूलता,

35यह प्रेम अब अटूट हो चुका है और अन्य सब विकार दूर हो गए हैं।॥ रहाउ॥

36जिस प्रकार चातक बूंद को छोड़ नहीं सकता, मछली जल बिना घड़ी भी नहीं रहती।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं