गुरु ग्रंथ साहिब 111 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1पारब्रह्म-प्रभु ने चौरासी लाख योनियों में अनंत जीव उत्पन्न किए हैं।
2जिस जीव पर वह अपनी दया-दृष्टि करता है, उसको गुरु से मिला देता है।
3वह जीव अपने पापों को धोकर हमेशा के लिए पवित्र हो जाता है और सत्य दरबार के अन्दर नाम से सुहावना लगता है॥६॥
4यदि प्रभु कर्मो का हिसाब माँगेगा, वह तब कौन दे सकेगा?
5तब द्वैत अथवा त्रिगुणी अवस्था में कोई सुख प्राप्त नहीं होना।
6सत्यस्वरूप परमात्मा स्वयं क्षमाशील है और क्षमा करके अपने आप से मिला लेता है॥७॥
7प्रभु स्वयं ही सब कुछ करता है और स्वयं ही जीवों से करवाता है।
8पूर्ण गुरु के उपदेश से ही प्रभु अपने साथ मिला लेता है।
9हे नानक ! जिस जीव को प्रभु के नाम की शोभा मिलती है, सृष्टि का स्वामी स्वयं ही उसे अपने मिलाप में मिलाता है॥ ८ ॥२॥३॥
10माझ महला ३ ॥
11एक परमेश्वर ही अदृष्य होकर सर्वत्र भ्रमण करता रहता है।
12जिस व्यक्ति ने गुरु के माध्यम से उसके दर्शन कर लिए हैं, उसका मन उसके प्रेम में भीग गया है।
13उसने अपनी तृष्णा को त्यागकर सहज सुख प्राप्त कर लिया है। फिर उसने एक प्रभु को ही अपने मन में बसाया है॥१॥
14मैं उन पर कुर्बान हूँ, मेरी आत्मा कुर्बान है, जो एक ईश्वर से अपनी सुरति लगाते हैं।
15गुरु की मति द्वारा उसका मन एक ही आत्मस्वरूप घर में आकर बसता है और सत्य प्रभु के प्रेम में मग्न हो जाता है।॥१॥ रहाउ॥
16हे प्रभु ! यह संसार भ्रम में पड़ा हुआ है और तूने स्वयं ही इसे भ्रम में डाल दिया है।
17एक ईश्वर को विस्मृत करके यह लोभ लालच में ग्रस्त हुआ पड़ा है।
18रात-दिन यह भ्रम का भृमित हुआ हमेशा भटकता रहता है और नाम के बिना कष्ट उठाता है॥२ ॥
19जो भाग्य विधाता के प्रेम में मग्न रहते हैं,
20वह गुरु की सेवा करके चारों युगों में प्रसिद्ध हो जाते हैं।
21जिस प्राणी को प्रभु स्वयं महानता प्रदान करता है, वह ईश्वर के नाम में लीन हो जाता है।॥३॥
22माया-मोह में ग्रस्त मनुष्य परमेश्वर को स्मरण नहीं करता।
23फिर यमदूतों की नगरी में जकड़ा हुआ वह कष्ट सहन करता है।
24मनमुख व्यक्ति अन्धा एवं बहरा है, उसे कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता और गुनाहों में ही नष्ट हो जाता है॥४॥
25हे प्रभु! कई जीव तेरे प्रेम में मग्न रहते हैं, जिन्हें तूने ही नाम के साथ लगाया है।
26प्रेमा-भक्ति द्वारा वह तेरे हृदय को अच्छे लगते हैं।
27वह सदैव सुखदाता सतिगुरु की सेवा करते रहते हैं और ईश्वर स्वयं ही उनकी समस्त मनोकामनाएँ पूरी करता है॥५॥
28हे पूज्य परमेश्वर ! जो व्यक्ति सदैव तेरी शरण में रहता है,
29तू स्वयं ही उसे क्षमादान करके शोभा प्रदान करते हो।
30जो व्यक्ति भगवान का नाम-सिमरन करता रहता है, यम उसके निकट नहीं आता ॥६ ॥
31जो व्यक्ति भगवान को अच्छे लगते हैं, वह रात-दिन भगवान के प्रेम में मग्न रहते हैं।
32मेरे प्रभु ने उनका सतिगुरु से मिलाप करवा कर अपने साथ मिला लिया है।
33हे सत्य स्वरूप परमेश्वर ! जो व्यक्ति सदैव तेरी शरण में हैं। तुम स्वयं ही उन्हें सत्य का ज्ञान प्रदान करते हो।॥७॥
34जो व्यक्ति सत्य प्रभु को समझ लेते हैं, वे सत्य में ही लीन रहते हैं।
35वह हरि का यशोगान करते हैं और सत्य का ही बखान करते हैं।
36हे नानक ! जो नाम में मग्न रहते हैं, वे निर्लेप हैं और अपने निज घर आत्मस्वरूप में समाधि लगाते हैं॥ ८ ॥ ३ ॥ ४ ॥
37माझ महला ३ ॥
38जो व्यक्ति शब्द द्वारा अपने अहंकार को नष्ट कर देता है, वही मृत माना जाता है।
39उसे काल (मृत्यु) भी नहीं कुचलता और न ही कोई कष्ट दुखी करता है।
40उसकी ज्योत परम ज्योति में मिलकर उस में ही समा जाती है। उसका मन भी सत्य नाम को सुनकर सत्य में ही समा जाता है॥१॥
41मैं उन पर कुर्बान हूँ, जो ईश्वर के नाम द्वारा जगत् में शोभा पाते हैं।
42जो व्यक्ति सतिगुरु की सेवा करते हैं एवं सत्य प्रभु में अपना चित्त लगाते हैं, वह गुरु के उपदेश द्वारा सहज अवस्था में लीन रहते हैं।॥१॥ रहाउ॥
43मनुष्य का शरीर कच्चा अर्थात् क्षणभंगुर है। शरीर जीवात्मा का वस्त्र है और जीवात्मा इस क्षणभंगुर वस्त्र को पहनकर रखती है।
44जीवात्मा माया के मोह में लीन रहने के कारण अपने आत्मस्वरूप को नहीं पा सकती।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं