सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1119 · Raag Kaydaaraa · Guru Raam Daas Ji

1मन का अभिमान जो कुछ तू जानता है, इसे दूर करो और अपने आप को नियंत्रण में रखो।

2नानक विनती करते हैं कि हे स्वामी ! दयालु होकर हमें संतजनों की चरण-धूल बना॥२॥१॥२॥

3केदारा महला ५ घरु २

4वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

5हे माँ ! संतों के संग जागृति प्राप्त हुई है,

6प्रिय के रंग देखती सुखनिधि हरिनाम को ही जपती हूँ॥ रहाउ॥

7प्रभु -दर्शन की लालसा में ऑखें उधर ही लगी हैं एवं

8इसने अन्य चीजों की चाह छोड़ दी है॥१॥

9अब गुरु पा लिया है, जो परम सुख प्रदान करने वाला है, उसके दर्शन करते ही मन उसमें लीन हो चुका है।

10नानक का कथन है कि प्रभु को देखकर मन में आनंद ही आनंद उत्पन्न हो गया है और उस प्रेिय की अमृत-वाणी ने विभोर कर दिया है॥ २॥ १॥

11केदारा महला ५ घरु ३

12वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

13हे दयासागर ! इस दीन की विनती सुनो;

14हे अनाथों के नाथ ! मन केवल एक ही है, मगर पाँच (कामादिक) दास एवं तीन (गुण रूपी) दोषी पीड़ा दे रहे हैं,

15हे कृपानिधि ! इनसे मुझे बचा लो॥ रहाउ॥

16तीर्थ-यात्रा के मैं अनेक यत्न करता हूँ,

17छः कर्मों की युक्ति में ध्यान लगाता हूँ,

18सब उपाय कर हार चुका हूँ, मगर विकराल विकार नहीं छूटते॥१॥

19हे करुणामय ! तेरी शरण में आया हूँ, तेरी वंदना करता हूँ।

20हे श्रीहरि ! सृष्टि के जन्म-मरण के बन्धन तू ही काटनेवाला है,

21केवल तू ही दीनों पर दया करने वाला है।

22नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तेरे चरणों का ही आसरा है।

23मेरा भ्रम-मोह के समन्दर से उद्धार

24संतजनों के चरणों में लग कर हो पाया है॥२॥१॥२॥

25केदारा महला ५ घरु ४

26वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

27हे सुखनिधान, स्वामी ! मैं तेरी शरण में आया हूँ।

28मन में तेरे नाम से प्रीति लग चुकी है, तुझसे हरिनाम दान मांगता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

29हे सुखदाता, परिपूर्ण परमेश्वर ! कृपा कर मेरा मान रखो,

30हे स्वामी ! साधुजनों के संग प्रीति प्रदान करो, ताकि जिव्हा से मैं तेरे गुणों का बखान करता रहूँ॥१॥

31हे गोविन्द, गोपाल, दयालु परमेश्वर ! तेरी ज्ञान कथा अति पावन है।

32नानक को हरि के रंग में रंग दो ताकि उसका ध्यान तेरे चरण-कमल में लवलीन रहे॥ २॥ १॥ ३॥

33केदारा महला ५॥

34मेरे मन में परमात्मा के दर्शन का चाव है,

35हे परमेश्वर ! कृपा कर सत्संग में मिला दो और तुम अपना नाम दे दो॥ रहाउ॥

36मैं प्यारे सत्पुरुष की सेवा में तल्लीन रहता हूँ, जब उसका यश सुनता हूँ तो मन में भरपूर आनंद उत्पन्न हो जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं