गुरु ग्रंथ साहिब 1117 · Raag Tukhaari · Guru Raam Daas Ji
1धन-दान लेने वाले पुरोहितों ने उपाय, बुद्धिमत्ता कर सब गोलक उठवा लिए।
2इस तरह वे गंगा (हरिद्वार) आए और वहाँ उन्होंने विचित्र लीला रची॥ ५॥
3फिर नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति मिलकर गुरु जी के पास आए और उनका आसरा ग्रहण किया।
4जब उन्होंने ईश्वर के बारे में अपनी जिज्ञासा व्यक्त की तो गुरु जी ने स्मृतियों के आधार पर उन्हें संतुष्टि प्रदान की।
5गुरु जी ने स्मृतियों एवं शास्त्रों के आधार पर तथ्य बताया कि शुकदेव, भक्त प्रहलाद एवं श्री रामचन्द्र जी ने क्योंकर ईश्वर की सत्ता मानकर उसका ध्यान किया और
6देह रूपी नगर किले में कामादिक पाँच चोरों को चकनाचूर कर दिया।
7वहाँ नित्य प्रभुकीर्तन, पुराणों की कथा और दान-पुण्य हो रहा था, नानक का कथन है कि गुरु के वचन से उनको प्रभु-भक्ति प्राप्त हुई।
8नगर के कुलीन पुरुष मिलकर गुरु जी के सान्निध्य में आए और उनका आसरा पाया॥ ६॥ ४॥ १०॥तुखारी महला ४॥
9तुखारी छंत महला ५
10वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
11हे स्वामी ! मैं तुम पर कोटि-कोटि कुर्बान जाता हूँ, गुरु द्वारा मैंने यह मन तुझे अर्पण कर दिया है।
12तुम्हारा शब्द सुनकर मेरा मन भीग गया है,
13यह मन तेरे प्रेम में ऐसे भीग गया है, जैसे मछली का जल से प्रेम होता है।
14हे प्रभु ! तेरा घर अपार है, इसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती।
15हे सर्वगुणों के दाता, स्वामी ! दीन की एक विनय सुनो,
16नानक तुझ पर बलिहारी जाता है, अपने दर्शन प्रदान करो, यह प्राण भी तुझ पर न्यौछावर हैं।॥ १॥
17यह तन-मन, सब गुण तेरी देन है,
18तेरे दर्शन पाने के लिए टुकड़े-टुकड़े होने के लिए भी तैयार हूँ।
19हे मेरे प्रभु ! सुनो, पल भर तुझे देखकर ही में जीवन पाता हूँ।
20तेरा अमृत नाम सुना जाता है, अगर तेरी कृपा हो जाए तो मैं भी पान कर सकता हूँ।
21जैसे पपीहा स्वाति-बूंद के लिए प्यासा होता है, वैसे ही जीव-स्त्री प्रभु की आशा में प्यासी बनी हुई है।
22नानक का कथन है कि हे मेरे प्रभु ! मुझे दर्शन प्रदान करो, क्योंकि यह प्राण भी तुझ पर न्यौछावर हैं।॥ २॥
23हे परमेश्वर, तू परम सत्य है, संसार का मालिक है, अमित साहूकार है।
24तू प्रियतम प्यारा तो हमें दिल एवं जान से भी बहुत प्यारा है।
25प्राणों को सुख देने वाले प्रभु का बोध गुरु से ही होता है, सब रंग-तमाशे उसके ही बनाए हुए हैं।
26प्राणी वही कर्म करता है, जैसा तू आदेश करता है।
27जिस पर जगदीश्वर ने कृपा की है, उसने साधु-संगत में मन को जीत लिया है।
28नानक का कथन है कि यह प्राण भी तुम पर कुर्बान हैं, क्योंकि यह आत्मा-शरीर सब तेरी देन है॥३॥
29संत पुरुषों के सदके मुझ गुणविहीन को परमात्मा ने बचा लिया है,
30सतगुरु ने मुझ जैसे पापी का पर्दा ढक लिया है।
31आत्मा एवं प्राणों को सुख देने वाला प्रभु ही हमारे पाप-अपराध ढकने वाला है।
32वह अविनाशी, अव्यक्त, संसार का स्वामी, पूर्ण परमपुरुष विधाता है।
33हे प्रभु ! तेरी प्रशंसा कही नहीं जा सकती (अर्थात् तेरी प्रशंसा का कोई अंत नहीं), कौन कह सकता है कि तू कँहा कँहा व्याप्त है।
34दास नानक उस गुरु पर बलिहारी है, जिससे हरिनाम मिल जाता है॥४॥१॥११॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं