सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1116 · Raag Tukhaari · Guru Raam Daas Ji

1श्रद्धा-भय के बिना किसी ने भी प्रेम नहीं पाया और बिना श्रद्धा-भय के कोई भी पार नहीं हुआ।

2गुरु नानक का कथन है कि हे प्रभु ! भय, श्रद्धा एवं प्रीति उसी के अन्तर्मन में उत्पन्न होती है, जिस पर तू अपनी कृपा करता है।

3हे मेरे स्वामी ! तेरी भक्ति के भण्डार तो अनगिनत हैं, पर जिसे तू देता है, उसे ही यह मिलता है।॥ ४॥ ३॥

4तुखारी महला ४॥

5गुरु का दर्शन हमारे लिए अभिजित् नक्षत्र में (कुरुक्षेत्र तीर्थ) स्नान का पुण्य फल पाना है,

6इससे दुर्मति की मैल निवृत्त हो गई है और अज्ञान का अंधेरा मिट गया है।

7गुरु-दर्शन पाकर अज्ञान दूर हो गया है और अन्तर्मन में ज्योति का प्रकाश हो गया है।

8इससे जन्म-मरण का दुख क्षण में विनष्ट हो गया है और अविनाशी प्रभु पा लिया है।

9ईश्वर ने स्वयं ही इस पर्व का सुनहरी अवसर बनाया, सतगुरु (अमरदास जी) कुरुक्षेत्र तीर्थ स्नान के लिए गए।

10वास्तव में गुरु का दर्शन ही अभिजित् नक्षत्र में तीर्थ-स्नान का पुण्य फल है॥ १॥

11सतगुरु (अमरदास जी) के संग उनके शिष्य भी मार्ग पर चल पड़े,

12पल-पल रास्ते में भक्ति-ज्ञान की गोष्ठी हुई।

13शिष्यजनों के साथ प्रभु-भक्ति की चर्चा चलती रही और सब लोग उनके दर्शनार्थ आए।

14जिन्होंने गुरु का दर्शन किया, उनको प्रभु ने स्वयं मिला लिया।

15लोगों का उद्धार करने के लिए सतगुरु (अमरदास जी) ने तीर्थ जाने का कार्य किया।

16गुरु के संग उनके शिष्यजन भी रास्ते पर चल पड़े॥ २॥

17सतगुरु (अमरदास जी) पहले कुरुक्षेत्र आए, जहां उनके दर्शन का पर्व हो गया।

18संसार में इसकी खबर हो गई और तीनों लोकों के जीव दर्शनार्थ आए।

19तीनों लोकों के देवगण, मनुष्य एवं मुनिजन इत्यादि सभी गुरु-दर्शन के लिए आए।

20जिन्होंने पूरे गुरु के दर्शन व चरण-स्पर्श किए, उनके सब पाप-अपराध नाश हो गए।

21योगी, दिगंबर एवं छ: प्रकार के सन्यासियों ने उनके साथ ज्ञान-गोष्ठी की और गुरु (के हरिनाम मंत्र) को माना।

22सतगुरु (अमरदास जी) पहले कुरुक्षेत्र आए, जहां उनका दर्शन-पर्व हो गया॥ ३॥

23तदुपरांत गुरु जी यमुना पर गए, जहाँ उन्होंने हरिनाम का जाप किया।

24वहाँ पर कराधिकारी भेंट-उपहार देकर गुरु जी से मिले और गुरु के शिष्य कहलवाने वाले सब व्यक्ति बिना कर (टैक्स) ही आगे निकल गए।

25जिन्होंने सतगुरु के निर्देशानुसार चलकर ईश्वर का भजन किया, वे सभी संसार के बन्धनों से मुक्ति पा गए।

26गुरु के वचन द्वारा जो सन्मार्ग पर चलते हैं, उन्हें यम रूपी कराधिकारी भी तंग करने नहीं आते।

27जगत के सब लोग गुरु का यश गाते हैं, गुरु का नाम जपने से सभी मुक्त हो गए।

28तदन्तर गुरु जी यमुना पर गए, जहाँ उन्होंने हरिनाम का भजन किया॥४॥

29उसके उपरांत वे गंगा (हरिद्वार) आए और वहाँ पर उन्होंने विचित्र लीला-रची।

30संत-गुरु के दर्शन कर सभी मोहित हो गए और किसी ने कौड़ी भर दाम नहीं लिया।

31धन-दान लेने वाले पुरोहित-पण्डितों की गोलक में कुछ भी नहीं डाला और वे दंग रह गए।

32वे कहने लगे, हे भाई ! हम क्या करें, किससे मांगने का यत्न करें, सभी सतगुरु की शरण में जा रहे हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं