सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1115 · Raag Tukhaari · Guru Raam Daas Ji

1जिन्होंने गुरु के वचनानुसार सत्य बोला है, ईश्वर ने उनका समूचा जीवन सफल कर दिया है।

2वही व्यक्ति धन्य एवं महापुरुष हैं जो गुरु के उपदेशानुसार प्रभु का जाप कर विषम संसार-सागर से पार उतर गए हैं।

3जिन्होंने गुरु-मतानुसार प्रभु की उपासना की है, ऐसे सेवक जन ईशोपासना करके प्रभु-दरबार में मान्य हो गए हैं।॥३॥

4हे श्री हरि ! तू अन्तर्यामी है, जैसे तू चलाता है, वैसे ही हम चलते हैं।

5हमारे हाथ कुछ भी नहीं, अगर तू मिला ले तो हम तुझसे मिल जाते हैं।

6हे स्वामी ! जिनको तू अपने साथ मिला लेता है, उनका कर्मों का लेख छूट जाता है।

7हे भाई ! उनकी गणना नहीं की जा सकती, जिनको गुरु के वचन द्वारा प्रभु ने मिला लिया है।

8नानक का फुरमान है कि ईश्वर उन पर ही दयालु हुआ है, जिन्होंने गुरु की रज़ा को भला माना है।

9हे हरि ! तू अन्तर्यामी है, जैसे तू चलाता है, वैसे ही हम चलते हैं॥४॥२॥

10तुखारी महला ४॥

11हे जगदीश्वर ! तू जगत का जीवन, सब बनानेवाला एवं सृष्टि का मालिक है।

12जिनके ललाट पर प्रारम्भ से ही भाग्य लिखा हुआ है, उन भक्तों ने ही तेरी पूजा-अर्चना की है।

13जिनके भाग्य में शुरु से ही लिखा है, उन्होंने हरिनाम की आराधना की है।

14जिन्होंने गुरु के वचन द्वारा हरि का जाप किया, उनके पाप एक पल में ही दूर हो गए हैं।

15जिन्होंने हरिनाम जपा है, वे भक्तजन धन्य हैं, उनके दर्शन पाकर सनाथ बन गया हूँ।

16हे ईश्वर ! तू जगत का जीवन, सब बनानेवाला एवं सृष्टि का स्वामी है॥१॥

17हे ईश्वर ! तू जल, थल, नभ सब में व्याप्त है, सबसे बड़ा एवं हम सबका मालिक है।

18जिन्होंने एकाग्रचित होकर हरिनाम जपा, ऐसे कितने ही भक्तजन हरिनाम जप-जपकर मुक्ति पा गए हैं।

19हरिनाम जपने वाले प्राणी संसार के बन्धनों से मुक्त हो गए हैं और प्रभु द्वार में उन्हीं के मुख उज्ज्वल हुए हैं।

20वे लोक-परलोक में सुखी हुए हैं और ईश्वर ही उनका रखवाला बना है।

21हे भाई जनो ! सुनो, गुरु-संतों की संगति में ही प्रभु की उपासना सफल हुई है।

22हे मालिक ! एकमात्र तू ही सबसे बड़ा है, जल, थल, नभ सब में तू ही व्याप्त है॥ २॥

23हे प्रभु ! एक तू ही सर्वव्यापक है, केवल तू ही कण-कण में रमण कर रहा है,

24वन-वनस्पति, तीनों लोक, समूची सृष्टि हरिनाम जप रही है।

25सभी जीव हरिनाम की स्तुति कर रहे हैं, असंख्य, अनगिनत जीव ईश्वर का भजन करने में तल्लीन हैं।

26पर वे साधु-संत धन्य हैं, जो कर्ता प्रभु को भा जाते हैं।

27हे सृष्टिकर्ता ! जिसने हृदय में सदा हरिनामोच्चारण किया है, उस गुरु-संत पुरुष के मुझे सफल दर्शन करवा दो।

28हे प्रभु ! एक तू ही हर स्थान पर मौजूद है, केवल एक तू ही संसार के कण-कण में रमण कर रहा है॥ ३॥

29तेरी भक्ति के भण्डार तो अनगिनत हैं, हे मेरे स्वामी ! पर जिसे तू देता है, उसे ही मिलता है।

30जिसके मस्तक पर गुरु का हाथ है, उसके ही हृदय में प्रभु-गुण टिकते हैं।

31उसके ही हृदय में प्रभु-गुण टिकते हैं, जिसके अन्तर्मन में पूर्ण निष्ठा बनी हुई है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं