सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1114 · Raag Tukhaari · Guru Raam Daas Ji

1मेरा अन्तर्मन प्रसन्न हो जाए और बाबीहे की तरह प्रिय-प्रिय करता नित्य हरि का नामोच्चारण करता रहे।

2मैं प्रिय-प्रिय उच्चारण करता रहूँ, शब्द प्रभु द्वारा मेरा उद्धार हो जाएगा, प्रियतम के दर्शन बिना मन तृप्त नहीं होता।

3यदि जीव रूपी कामिनी शब्द का श्रृंगार करे, तो वह नित्य हरिनाम का ध्यान करती रहेगी।

4हे प्रियतम ! मुझ याचक को दया का दान देकर अपने साथ मिला लो।

5दिन-रात गुरु-परमेश्वर का ही भजन किया है, अतः हम सतगुरु पर कुर्बान हैं।॥ २॥

6हम पत्थर हैं, गुरु नैया है, जो विषम संसार-सागर से पार उतार देता है।

7हे गुरु ! मुझ मूर्ख को सहज-स्वभाव शब्द प्रदान करो, ताकि मेरा उद्धार हो जाए।

8हम मूर्ख तेरे रहस्य का अनुमान नहीं लगा पाए, तू अगम्य एवं बड़ा माना जाता है।

9हे दया के घर ! तू स्वयं दयालु है, अतः दया करके अपने साथ मिला लो, हम तो गुणविहीन एवं नाचीज हैं।

10अनेक जन्म पाप करते हुए भटकते रहे, परन्तु अब तेरी शरणागत आए हैं।

11हे प्रभु ! दया करके हमें बचा लो, चूंकि हम तो सतगुरु के चरणों में लग गए हैं।॥ ३॥

12गुरु पारस है, जिसके संग मिलकर हम लोहे जैसे स्वर्णयुक्त हो गए हैं।

13आत्म-ज्योति को परम-ज्योति से मिलाया गया, यह शरीर रूपी दुर्ग सुन्दर बन गया।

14शरीर रूपी सुन्दर दुर्ग ने प्रभु को मोह लिया है, वह इसमें ही स्थित है, फिर श्वास-ग्रास से उसे कैसे भुलाया जा सकता है।

15शब्द-गुरु द्वारा अदृश्य, अगोचर प्रभु को पा लिया है, अतः मैं ऐसे सतगुरु पर कुर्बान हूँ।

16अगर सच्चा सतगुरु चाहे तो यह शीश भी उसके चरणों में भेंट कर दूँ।

17नानक की विनती है कि हे दाता प्रभु ! दया करो, ताकि वह तेरी गोद में लवलीन हो जाए॥ ४॥ १॥

18तुखारी महला ४॥

19ईश्वर अगम्य, असीम, परे से परे, अपरंपार है।

20हे जगदीश्वर ! जो जन तुम्हारा ध्यान करते हैं, वे विषम भवसागर से पार उतर जाते हैं।

21इस विषम संसार-सागर से वही पार हुआ है, जिसने हरिनाम का चिंतन किया है।

22जो निष्ठापूर्वक गुरु के वचनानुसार चलता है, उसे प्रभु ने स्वयं ही अपने साथ मिला लिया है।

23प्रभु की कृपा हुई तो आत्म-ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो गई।

24वह परमशक्ति ईश्वर अगम्य, अगाध, अनंत एवं अपरंपार है॥ १॥

25हे स्वामी ! तुम अगम्य-अथाह हो और संसार के कण-कण में तू ही रमण कर रहा है।

26तू अदृश्य, रहस्यातीत एवं अपहुँच है और गुरु के वचन से तुझे पाया जा सकता है।

27वे लोग धन्य-धन्य एवं पूर्ण पुरुष हैं, जिन्होंने गुरु-संत की संगति में मिलकर प्रभु महिमा का गान किया है।

28गुरुमुख के पास विवेक बुद्धि एवं चिंतन-मनन की बात होती है अतः शब्द गुरु द्वारा वह पल-पल प्रभु का ध्यान करता है।

29अगर गुरमुख बैठता है तो प्रभु-नाम ही बोलता है और खड़े होकर भी प्रभु के गुण गाता है।

30हे स्वामी ! तू अगम्य-असीम है और संसार के कण-कण में तू ही व्याप्त है॥२॥

31जिन्होंने गुरु-मतानुसार प्रभु की उपासना की है, ऐसे सेवक जन ईशोपासना करके दरबार में मान्य हो गए हैं।

32उनके करोड़ों पाप क्षण में प्रभु निवृत कर देता है।

33जिन्होंने एकाग्रचित होकर ईश्वर की आराधना की है, उनके पाप-दोष सब नष्ट हो गए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं