सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1113 · Raag Tukhaari · Guru Nanak Dev Ji

1जिसने समूचा जगत उत्पन्न किया है, उस सत्यस्वरूप ओंकार की अर्चना करो।

2उस गुरु-परमेश्वर ने पवन, पानी, अग्नि इत्यादि को नियंत्रण में कर जगत तमाशा दिखाया है।

3ऐ मन ! हरिनाम का चिंतन ही तेरा पूजा-पाठ, तपस्या एवं संयम है, यही तेरा धर्म है।

4हरिनाम का जाप करो, क्योंकि यही सच्चा साथी, संबंधी एवं प्रियतम है॥ २॥

5ऐ मन ! तू स्थिर रह, चोट मत खाना।

6प्रभु के गुण गाकर सहज-स्वभाव समा जाना।

7प्रभु के गुण गाकर प्रेम में लीन रहना, गुरु-ज्ञान का सुरमा लगाओ।

8इससे तीनों लोकों के दीपक परमेश्वर का आलोक प्राप्त हो जाएगा, उस द्वारा कामादिक पाँच दूतों को समाप्त कर दोगे।

9गुरु से मिलकर सब कार्य संवर जाते हैं, भय को दूर कर निर्भय होकर दुस्तर संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है।

10यदि ईश्वर स्वयं कृपा धारण करे तो उसके प्रेम में उस जैसा ही रूप-रंग हो जाएगा॥ ३॥

11ऐ मन ! तू क्या लेकर आया था, अंततः क्या लेकर यहां से जाएगा?

12अगर भ्रम की निवृति होगी तो तेरा छुटकारा निश्चित है।

13हरिनाम धन संचित कर और शब्द-गुरु के द्वारा प्रेम की पहचान कर।

14पावन शब्द के फलस्वरूप मन की मैल निवृत्ति कर सच्चे घर को जान ले।

15हरिनाम रूपी यश पाकर तू वास्तविक घर आएगा और जी भरकर अमृत पान प्राप्त होगा।

16हरिनाम का भजन करो, शब्द द्वारा आनंद पाओ, उत्तम भाग्य से प्रभु का यशोगान होता है।॥ ४॥

17ऐ मन ! सीढ़ियों के बिना इमारत पर कैसे चढ़ा जा सकता है,

18नौका के बिना दरिया से पार कैसे हुआ जा सकता है।

19अपार प्रियतम साजन (संसार-समुद्र के) उस पार है, शब्द-गुरु की सुरति पार करवाने वाली है।

20साधु-संगति में मिलकर आनंद प्राप्त किया जा सकता है और फिर पछताना नहीं पड़ता।

21हे दीनदयाल ! दया कर, हरिनाम रूपी संगति प्रदान करो।

22नानक की विनती है कि हे प्रियतम ! मेरी विनय सुनो, शब्द-गुरु द्वारा मन को समझा दो॥ ५॥ ६॥

23तुखारी छंत महला ४

24वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

25दिल में प्रभु का ही प्रेम बसा हुआ है, फिर उसके बिना कैसे जिंदा रहा जा सकता है।

26जब तक उसके दर्शन नहीं होते तो क्योंकर अमृतपान हो सकता है।

27क्योंकर अमृतपान किया जाए, प्रभु बिन कैसे जिया जाए, उसके बिना रहा नहीं जा सकता।

28मन रात-दिन बबीहे की तरह प्रिय-प्रिय करता है और प्रियतम बिना प्यास नहीं बुझ सकती।

29हे प्यारे प्रभु ! अपनी कृपा करो, क्योंकि सदा तेरे नाम का ही जाप किया है।

30गुरु के शब्द द्वारा मुझे प्रियतम प्रभु मिल गया है, अतः मैं सतगुरु पर बलिहारी हूँ॥ १॥

31जब प्रियतम प्रभु के दर्शन करूँ तो प्रेमपूर्वक उसी के गुण-गान में लीन रहूँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं