सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1112 · Raag Tukhaari · Guru Nanak Dev Ji

1नित्य प्रभु-प्रेम में रत रहने वाली सहज-स्वभाव ही मिल जाती है।

2सहज-स्वभाव मिलन से ही परम सुख मिलता है, क्रोध मत करो, अहम् का निवारण कर लीन हुआ जा सकता है।

3गुरु के माध्यम से सत्य में लीन जीव-स्त्री का मिलाप हो जाता है परन्तु स्वेच्छाचारी आवागमन में पड़ी रहती है।

4अगर लोक-लाज छोड़कर प्रभु-भक्ति में नाचने लग गई तो घूंघट कैसा।

5गुरु नानक का मत है- सार तत्व यही है कि गुरु के द्वारा जीव को आत्म-स्वरूप की पहचान होती है॥ ४॥ ४॥

6तुखारी महला १॥

7मेरा प्रियतम प्रभु रंगीला है, हम भी उसी के उपासक हैं।

8जब से गुरु ने उस अदृष्ट प्रभु के दर्शन करवाए हैं, उसके सिवा हम किसी अन्य को नहीं ढूंढते।

9जब प्रभु की इच्छा हुई तो उसने कृपा कर दी और गुरु ने अदृष्ट प्रभु को दिखा दिया।

10संसार का जीवन-दाता परम पुरुष विधाता सहज ही मिल जाता है।

11हे दीनदयाल ! जब तू अपनी कृपा करता है, संसार-सागर से उद्धार हो जाता है, अतः सच्चा नाम प्रदान करो।

12नानक की विनती है कि हम तेरे दासों के भी दास हैं और तू सब जीवों का पोषक है॥ १॥

13भरपूर ब्रह्म में वह प्रियतम प्यारा (गुरु) व्याप्त है,

14गुरु रूप ईश्वर शब्द में ही रमण कर रहा है।

15गुरु रूप परमेश्वर तीनों लोकों का आधार है, उसका रहस्य पाया नहीं जा सकता।

16उसने कितने ही रंग एवं प्रकार के जीव उत्पन्न किए हैं और नित्य ही बढ़-चढ़कर देता रहता है।

17अपरंपार प्रभु स्वयं ही बनाता एवं बिगाड़ देता है और जो वह चाहता है, वही होता है।

18गुरु नानक का कथन है कि गुरु गुणों की माला में पिरोकर हीरा बनकर हीरे के साथ विंध जाता है॥ २॥

19गुण गुणों में लीन हुए ललाट पर नाम-स्मरण का भाग्यालेख था।

20जब परम-सत्य में विलीन हो गया तो आवागमन मिट गया।

21सत्य में लीन रहकर सत्य को पहचान लिया, सत्य में मिलन हो जाए तो यही मन को अच्छा लगता है।

22उस सच्चे परमेश्वर के सिवा अन्य कोई दृष्टिमान नहीं होता, सत्यनिष्ठ बनकर सत्य में समाया जा सकता है।

23प्रभु ने मेरा मन मोह लिया है और बन्धनों से छुटकारा हो गया है।

24हे नानक ! जब प्यारा प्रभु मिला तो आत्म-ज्योति, परम-ज्योति में विलीन हो गई।॥ ३॥

25सच्चा गुरु वह स्थान है, जहाँ से सच्चे घर (प्रभु) की खोज होती है।

26मन की मर्जी करने से प्राप्ति नहीं होती यदि गुरमुख बना जाए तो ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।

27ईश्वर सदैव देने वाला है, बड़ा प्रतिभावान् है, सत्य ही देता है और वही स्वीकार होता है।

28वह अमर, अयोनि, चिरस्थाई है और उसका सच्चा स्थान सदैव रहने वाला है।

29यदि परमेश्वर की ज्योति अन्तर्मन में प्रगट हो जाए तो हर रोज़ के कर्मों का लेख नहीं लिखा जाता।

30हे नानक ! सत्यनिष्ठ जीव परम-सत्य प्रभु की स्मृति में लीन रहता है और ऐसा गुरुमुख भवसागर से पार उतर जाता है॥ ४॥ ५॥

31तुखारी महला १॥

32ऐ मेरे मन ! तू समझ, क्यों नासमझ और अचेत बना हुआ है।

33अवगुणों को छोड़कर गुणों में लीन हो जा।

34अनेक स्वादों के लोभ में तू कर्म कर रहा है, अतः बिछुड़े हुए का यों मिलन नहीं होता।

35दुस्तर संसार-सागर में से कैसे पार हुआ जा सकता है, यम का डर मारता रहता है और यम का रास्ता दुखदायी है।

36सांझ-सवेरे मन ने राम नाम के भजन की महता को समझा नहीं, यम के मार्ग में क्या कर सकते हो।

37यदि गुरु के माध्यम से प्रभु की उपासना की जाए तो इन कर्म-बन्धनों से छुटकारा हो सकता है॥ १॥

38ऐ मेरे मन ! सब जंजाल छोड़ दो और

39परमपुरुष निराले प्रभु की उपासना करो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं