सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1111 · Raag Tukhaari · Guru Nanak Dev Ji

1गुरु साहिब फुरमाते हैं कि जो अहम् को मिटाकर प्रसन्न हो जाता है, उसके लिए लम्बा तारा चढ़ा रहता है।॥१॥

2गुरुमुख अभिमान को मिटाकर जाग्रत रहते हैं।

3उनके लिए सत्य का सवेरा बना रहता है और वे परम सत्य प्रभु में विलीन रहते हैं।

4गुरुमुख परम सत्य में लवलीन रहते हैं, यही उनके मन को भाता है और वे सदैव जाग्रत रहते हैं।

5गुरु उन्हें सच्चा नामामृत देता है और उनकी प्रभु-चरणों में लगन लगी रहती है।

6उनके अन्तर्मन में परम-ज्योति प्रगट हो जाती है, वे परम-सत्य को जान लेते हैं, मगर मनमुखी जीव भ्रमों में ही भूले रहते हैं।

7गुरु नानक का मत है कि गुरमुख जनों के लिए सत्य का भोर बना रहता है, उनका मन प्रसन्न हो जाता है और उनकी प्रभु-भक्ति में जागते ही जीवन रूपी रात्रि व्यतीत होती है।॥२॥

8जिसके हृदय-घर में गुण बस जाते हैं, उसके अवगुण समाप्त हो जाते हैं।

9एक ईश्वर ही सबमें रमण कर रहा है, उसके बिना कोई नहीं।

10घट-घट में केवल ईश्वर रमण कर रहा है, अन्य कोई नहीं और मन में मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है।

11जिसने जल, थल, तीन लोक, घट-घट बनाया है, वह प्रभु तो गुरु के माध्यम से ही जाना जाता है।

12सर्वकर्ता परमेश्वर सब कुछ करने योग्य है और उसने त्रिगुणात्मक माया को मिटा दिया है।

13गुरु नानक फुरमाते हैं कि ऐसी गुरु-शिक्षा प्राप्त की है कि अवगुण गुणों में लीन होकर दूर हो गए हैं।॥ ३॥

14आवागमन मिट गया है और सब भ्रम निवृत्त हो गए हैं।

15अहम्-भाव को मिटाकर मिलन हुआ तो शरीर सफल हो गया।

16गुरु ने अहम्-भाव को निवृत किया तो वह प्रगट हो गया और शोक-संताप निवृत्त हो गए।

17अपने आप को पहचानकर आत्म-ज्योति ब्रह्म-ज्योति में विलीन हो गई।

18जीव इहलोक में शब्द-गुरु द्वारा आचरण करता है और परलोक में पति-प्रभु के संग रहता है।

19गुरु नानक फुरमाते हैं कि सतगुरु ने जिसे प्रभु से मिला दिया है, उसकी संसार से निर्भरता दूर हो गई है॥ ४॥ ३॥

20तुखारी महला १॥

21जीव-स्त्री भुलावे में भूली रही और बार-बार भूल-भूलकर पछताती है।

22पति-प्रभु को छोड़कर मोह-माया में मग्न रही, मगर पति-प्रभु की महत्ता को नहीं जाना।

23प्रियतम को छोड़कर अवगुणों में लीन रही, जिसके फलस्वरूप जीव-स्त्री का जीवन विधवा की तरह बना रहा।

24वह काम, क्रोध, अहंकार में विनष्ट हुई और अहम्-भावना में पड़कर दुख भोगती रही।

25जब मौत का बुलावा आया तो आत्मा रूपी हंस शरीर में से निकल कर उड़ गया और भस्म रूपी शरीर भस्म में ही मिल गया।

26गुरु नानक का फुरमान है कि प्रभु-नाम से विहीन जीव-स्त्री भूल-भूल कर पछताती है॥ १॥

27हे प्यारे प्रभु ! मेरी एक विनती सुनो,

28तुम तो अपने घर में आनंदपूर्वक रह रहे हो, मगर मैं राख की ढेरी बनकर भटक रही हूँ।

29निःसंकोच कुछ भी कहा अथवा किया ही क्यों न जाए, मगर अपने प्रियतम के बिना कोई भी हमदर्द नहीं।

30हरिनामामृत रसों का भण्डार है, अतः गुरु-उपदेशानुसार जिव्हा से इस रस का पान करो।

31हरिनाम बिना कोई संगी-साथी नहीं, दुनिया में कितने लोग आते-जाते रहते हैं।

32गुरु नानक का मत है कि हरिनाम रूपी लाभ पाकर सच्चे घर जाना चाहिए क्योंकि यही तेरा, हे सच्चे प्रभु ! सच्चा उपदेश है॥ २॥

33विदेश गए सज्जन-प्रभु को जीव-स्त्री संदेश भेजती है।

34नयनों में जल भरकर वह सज्जन का स्मरण करती है।

35नयनों में जल भरकर उसके गुणों को स्मरण करती हुई यही चाहती है कि प्यारे प्रभु को कैसे मिला जाए।

36जाने का रास्ता कठिन है, प्रियतम को कैसे पाया जा सकता है?

37गुरु के उपदेश द्वारा अगर तन-मन समर्पित कर दे तो बिछुड़ी हुई का प्रभु से मिलन हो जाता है।

38गुरु नानक का कथन है कि हरिनाम अमृतमय वृक्ष, महारस एवं फलदायक है और प्रियतम से मिलकर ही वह इस रस को चख पाती है॥ ३॥

39हे प्रभु ! अपने चरणों में बुला लो, देरी मत करो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं