गुरु ग्रंथ साहिब 1110 · Raag Tukhaari · Guru Nanak Dev Ji
1गुरु नानक का कथन है कि वह दिन-रात प्रियतम-प्रभु के संग रमण करती है और उसका प्रभु रूपी सुहाग अटल है॥ १७॥ १॥
2तुखारी महला १॥
3हे सुन्दर नयनों वाली जीव स्त्री ! जीवन रूपी पहले प्रहर में अज्ञान रूपी रात्रि का अंधेरा बना रहता है।
4जन्म मिला है तो बारी आने पर आखिर मृत्यु को प्राप्त होना है, अतः नाम रूपी सौदा संभाल लो (अर्थात् हरिनाम जप लो)।
5मृत्यु की बारी आने पर कौन जगाता है, सोए हुए मनुष्य का यम सब खत्म कर देता है।
6अज्ञान रूपी रात अंधेरी है, तेरी कोई प्रतिष्ठा नहीं, पाँच विकार लूटते रहते हैं।
7मेरी विनती सुनो; अगम्य-अपार परमेश्वर ही रक्षा करने वाला है।
8गुरु नानक का कथन है कि मूर्ख जीव कभी जाग्रत नहीं होता और उसे अज्ञान रूपी अंधेरे का ज्ञान नहीं होता॥ १॥
9हे नादान ! जाग ले, जीवन का दूसरा प्रहर आ गया है।
10नाम रूपी सौदे को बचाकर रख ले, क्योंकि गुणों की खेती तो कामादिक खाते जा रहे हैं।
11प्रभु से प्रेम लगाकर इस खेती को बचा लो, जाग्रत रहने से कामादिक पशु रूपी चोर नुक्सान नहीं पहुँचा सकते।
12मृत्यु के मार्ग पर मत जाओ, न ही दुख प्राप्त करो; इस प्रकार यम का भय निवृत्त हो जाएगा।
13गुरु-उपदेश द्वारा सूर्य-चांद रूपी ज्ञान के दीपक जग जाएँगे, अतः मन एवं मुख से सच्चे प्रभु का भजन करो।
14गुरु नानक का कथन है कि हे मूर्ख ! अब तक तो तू सावधान नहीं हुआ, फिर जीवन के अगले हिस्से में कैसे सुख उपलब्ध होगा॥ २॥
15जीवन के तीसरे प्रहर में मोह की नींद बनी रहती है।
16पुत्र-पत्नी के द्वारा माया दुख-संताप प्रदान करती है।
17पुत्र-पत्नी, सांसारिक प्रेम में जीव चोगा चुगता है और नित्य माया-जाल में फँसता है।
18यदि हरिनाम का भजन किया जाए तो सुख प्राप्त हो सकता है, गुरु-उपदेशानुसार जीवन बिताने वाले को काल अपना ग्रास नहीं बनाता।
19हरिनाम बिना जीव दुख-तकलीफ भोगता है, काल उसे छोड़ता नहीं और वह जन्म-मरण में पड़ा रहता है।
20गुरु नानक का कथन है कि जीवन के तीसरे प्रहर में लोग त्रिगुणात्मक माया के मोह में व्याप्त रहते हैं।॥ ३॥
21जीवन के चौथे प्रहर में सूर्योदय हो गया अर्थात् बुढ़ापा आ गया, जीवन-अवधि समाप्त हो गई।
22जो दिन-रात सावधान रहा, उसने अपने घर को बचा लिया।
23जो गुरु की सलाहानुसार सावधान होकर हरिनाम का भजन करता है, उसकी जीवन रूपी रात्रि सुखमय हो जाती है।
24वह शब्द-गुरु के अनुसार आचरण करता है, जीवन-मृत्यु के बन्धन से छूट जाता है और प्रभु ही उसका सच्चा साथी बनता है।
25अन्यथा इस उम्र में हाथ-पैर थर-थर कांपते हैं, शरीर एवं पैर भी कांपने लग जाते हैं, ऑखों की रोशनी कम हो जाती है और अंततः शरीर भस्म हो जाता है।
26गुरु नानक का कथन है कि मन में हरिनाम बसाए बिना चारों युग केवल दुख ही मिलता है॥ ४॥
27इस प्रकार मृत्यु का बुलावा आ गया, कर्मों का हिसाब-किताब हुआ।
28स्वाद एवं सुखों की समाप्ति हुई और मृत्यु ने बांधकर साथ ले लिया।
29जब प्रभु को स्वीकार होता है तो जीव बंधकर चल देता है, यह हुक्म सुनाई एवं दिखाई नहीं देता।
30हर जीव अपनी बारी आने पर आ जाते हैं और अपने शुभाशुभ कर्मों का फल भोगते हैं।
31फिर घड़ी-पल का कर्मों का हिसाब लिया जाता है और सब जीवों को बुरा-भला सहन करना पड़ता है।
32गुरु नानक का कथन है कि शब्द द्वारा ईश्वर ने स्वयं ही संत-व्यक्तियों को अपने संग विलीन किया है और प्रभु ने स्वयं ही कारण बनाया है॥ ५॥२॥
33तुखारी महला १॥
34जिस पर परमेश्वर की कृपा-दृष्टि हो जाती है, उसके जीवन रूपी अंधेरे में ज्ञान का लम्बा तारा चढ़ा रहता है।
35पूर्ण भाग्यशाली सेवक को सतगुरु ने शब्द द्वारा ज्ञान का तारा दिखा दिया है।
36शब्द-गुरु ने ज्ञान का तारा दिखाया तो सत्य को स्मरण कर दिन-रात उसने उसका ही मनन किया।
37उसके हृदय-घर में से पाँच विकारों का छुटकारा हो गया और काम-क्रोध रूपी विष का अंत हो गया।
38गुरु की शिक्षा से अन्तर्मन में सत्य की ज्योति प्रज्वलित हो गई और उसने प्रभु की लीला को पहचान लिया।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं