गुरु ग्रंथ साहिब 110 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1फिर वह व्यक्ति अपनी सुरति प्रभु की सेवा में लगाता और अपना मन शब्द में जोड़ता है।
2वह अपने अहंकार को त्याग कर सदैव सुख पाता है और अपने माया के मोह को मिटा देता है॥ १॥
3मैं अपने सतिगुरु पर तन एवं मन से न्यौछावर हूँ,
4क्योंकि गुरु की मति द्वारा उसके हृदय में प्रभु ज्योति का प्रकाश हो जाता है। वह व्यक्ति प्रतिदिन भगवान की महिमा -स्तुति करता रहता है॥ १॥ रहाउ॥
5जब मनुष्य अपने तन एवं मन में ही उसकी खोज करता है तो उसे ईश्वर का नाम प्राप्त हो जाता है।
6वह अपने भटकते मन को स्थिर करता है और इसको अपने वश में रखता है।
7वह रात-दिन गुरु की वाणी गायन करता है और सहज ही प्रभु की भक्ति में जुट जाता है॥ २॥
8इस शरीर में विद्यमान अनंत गुणों वाली नाम रूपी वस्तु जब किसी को मिल जाती है
9तो वह सत्य प्रभु के दर्शन करता है।
10शरीर रूपी घर को आँखें, कान, नाक, मुँह इत्यादि नौ द्वार लगे हुए है। इन दरवाजों द्वारा मन बाहर भटकता रहता है। जब वह विकारों एवं मोह-माया से मुक्त होकर निर्मल हो जाता है तो वह दसम द्वार में आ जाता है। फिर निर्मल मन में अनहद शब्द वजने लगता है॥ ३ ॥
11परमात्मा सदैव सत्य है एवं उसकी महिमा भी सत्य है।
12गुरु की कृपा से ही परमात्मा मन में आकर निवास करता है।
13फिर व्यक्ति दिन-रात परमात्मा के प्रेम में मग्न रहता है और उसे सत्य दरबार की सूझ हो जाती है॥ ४॥
14मनमुख प्राणी को पाप एवं पुण्य की पहचान नहीं होती।
15उसकी बुद्धि मोह-माया में मग्न हो जाती है, जिससे वह भ्रम में फँसकर भटकती रहती है।
16मोह-माया में ज्ञानहीन मनमुख भगवान के मिलन के मार्ग को नहीं जानता, जिसके कारण वह बार-बार जन्मता एवं मरता रहता है।॥ ५ ॥
17गुरमुख गुरु की सेवा करके सदैव ही सुख प्राप्त करते हैं।
18वह अहंकार को नष्ट करके अपने भटकते हुए मन को विकारों की तरफ जाने से वर्जित करते हैं।
19गुरु की शिक्षा से उनका अज्ञानता का अँधेरा मिट जाता है और वज कपाट खुल जाते हैं।॥६॥
20वह अपना अहंकार मिटाकर भगवान को अपने मन में बसा लेते हैं।
21फिर वह अपना चित्त सदैव ही गुरु के चरणों में लगाकर रखते हैं।
22गुरु की कृपा से उनका मन एवं तन निर्मल हो। जाता है। फिर वह भगवान के निर्मल नाम का सिमरन करते रहते हैं।॥ ७॥
23हे प्रभु ! जीवों का जन्म एवं मृत्यु सब कुछ तुझ पर निर्भर है
24और हे प्रभु ! आप उसे महानता प्रदान करते हैं, जिसे तुम क्षमा कर देते हो।
25हे नानक ! तू सदैव ही परमेश्वर के नाम का भजन कर, जो मनुष्य के जन्म और मृत्यु को संवार देता है॥ ८ ॥ १ ॥ २ ॥
26माझ महला ३ ॥
27मेरा निर्मल प्रभु अगम्य एवं अपार है।
28वह तराजु के बिना जगत् को तोलता है।
29इस तथ्य को वहीं व्यक्ति समझता है, जो गुरु के सान्निध्य में रहता है। वह प्रभु के गुणों को कह-कह कर उसी में विलीन हो जाता हैII१II
30जो व्यक्ति भगवान के नाम को अपने हृदय में बसाते हैं। मेरा तन-मन उन पर न्यौछावर है।
31जो व्यक्ति सत्य प्रभु के नाम-सिमरन में मग्न हैं, वह रात-दिन जागृत रहते है और सत्य दरबार में बड़ी शोभा पाते हैं।॥१॥ रहाउ॥
32हे प्रभु ! तू स्वयं ही समस्त जीवों की प्रार्थना सुनता है और स्वयं ही उन्हें देखता रहता है।
33जिस पर प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वह व्यक्ति प्रभु के दरबार में स्वीकृत हो जाता है।
34जिसे प्रभु स्वयं ही अपने सिमरन में लगाता है, वहीं व्यक्ति उसके सिमरन में लगता है। गुरमुख ही सत्य नाम की साधना करते हैं।॥२॥
35वह किस का आश्रय ले सकता है, जिसको प्रभु स्वयं गुमराह करता है?
36विधाता के विधान को मिटाया नहीं जा सकता अर्थात् पूर्व जन्म का लिखा लेख मिटाया नहीं जाता।
37वह व्यक्ति बड़े भाग्यशाली हैं, जिन्हें सतिगुरु मिले हैं। पूर्ण भाग्य से ही सतिगुरु जी मिलते हैं।॥३॥
38जीव-स्त्री अपने पीहर (इहलोक) में दिन-रात अज्ञानता में निंद्रामग्न रहती है।
39उसके पति-प्रभु ने उसे विस्मृत कर दिया है और अवगुणों के कारण वह त्याग दी गई है।
40वह रात-दिन सदैव ही विलाप करती रहती है। अपने पति-प्रभु के बिना उसको सुख की निद्रा नहीं आती ॥ ४॥
41गुरमुख जीव-स्त्री ने अपने पीहर (इहलोक) में सुखदाता पति-प्रभु को जान लिया है।
42उसने अपना अहंकार त्याग कर गुरु के शब्द द्वारा अपने पति-प्रभु को पहचान लिया है।
43वह सदैव ही सुन्दर शय्या पर शयन करती है और पति-प्रभु के साथ रमण करती है। ऐसी जीव-स्त्री प्रभु के सत्य-नाम को अपना श्रृंगार बनाती है॥५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं