गुरु ग्रंथ साहिब 1109 · Raag Tukhaari · Guru Nanak Dev Ji
1आगे गर्मी एवं पीछे जाड़े की ऋतु देखकर मन विचलित होता है।
2दसों दिशाओं में वनस्पति की हरियाली है और जो सहज पकता है, वही मीठा है।
3गुरु नानक का कथन है कि आश्विन के महीने में हे प्यारे ! तुम आन मिलो; चूंकेि सतगुरु मध्यस्थ बन चुके हैं।॥ ११॥
4कार्तिक के महीने में जो प्रभु को अच्छा लगता है, वही फल प्राप्त होता है।
5वह दीपक सहज में जलता है, जिसे ज्ञान-तत्व से जलाया जाता है।
6ऐसे दीपक में प्रेम का तेल है, जीव-स्त्री पति-प्रभु से मिलकर आनंद एवं सुख की अनुभूति करती है।
7अवगुणों में मरने वाली छुटकारा नहीं पाती, मगर गुणों में लिप्त रहने वाली छूट जाती है।
8प्रभु जिन्हें नाम-भक्ति देता है, वे सच्चे घर में स्थान पाते हैं और उसकी आशा में ही रहते हैं।
9गुरु नानक का कथन है कि हे परमेश्वर ! किवाड़ खोलकर मिल जाओ, अन्यथा तेरे बिना एक घड़ी भी छः मास की मानिंद है॥ १२॥
10मार्गशीष माह (अगहन) का महीना भला है, इसमें ईश्वर के गुण अंतर्मन में बस जाते हैं।
11गुणवान् जीव-स्त्री निश्चल पति-प्रभु के गुण गाती रहती है।
12विधाता बुद्धिमान, चतुर एवं निश्चल है, समूचा संसार चंचल है।
13अगर प्रभु की रज़ा हो तो हृदय में ज्ञान-ध्यान के शुभ गुण बस जाते हैं।
14कवियों से प्रभु-नाम के गीत, नाद व कवित सुनकर दुःख निवृत्त हो जाते हैं।
15गुरु नानक का कथन है कि वही जीव रूपी नारी पति-प्रभु को प्यारी लगती है जो दिल से भक्ति करती है और सेवा में सदा तत्पर रहती है। १३॥
16पौष के महीने में इतना पाला पड़ता है किं वन-तृण वनस्पति सब सूख जाते हैं।
17हे ईश्वर ! मन, तन, मुख में तू ही बसा हुआ है, हमारे पास क्यों नहीं आता।
18मन-तन हर जगह ईश्वर ही व्याप्त है और शब्द-गुरु से ही आनंद प्राप्त होता है।
19अण्डज, जेरज, स्वेदज, उदभिज्ज, संसार के कण-कण में प्रभु-ज्योति ही समा रही है।
20हे दयालु दाता ! दर्शन दो, सद्बुद्धि प्रदान करो, ताकि गति प्राप्त हो जाए।
21गुरु नानक का कथन है कि जिसका प्रभु से प्रेम बन जाता है, वह सब रस आनंद पाता है॥ १४॥
22अंतर्मन में ज्ञान का तीर्थ स्नान माना तो माघ का महीना जीव के लिए पावन बन गया।
23मन प्रभु के स्तुतिगान में लीन हुआ तो वह सज्जन सहज स्वाभाविक मिल गया।
24प्रियतम के गुण धारण करके उसे भली लगूंगी। हे प्रभु ! तुझे स्वीकार हो तो मन रूपी सरोवर में स्नान करूँ।
25इसी से गंगा, यमुना त्रिवेणी संगम तथा सात समुद्र की पवित्रता मुझे प्राप्त होगी। दान-पुण्य एवं पूजा-अर्चना युग-युगांतर एक परमेश्वर का ही अस्तित्व माना है।
26गुरु नानक का कथन है कि माघ के महीने प्रभु का जाप महा आनंददायक है, यही अड़सठ तीर्थ में स्नान समान है॥१५॥
27फाल्गुन के महीने में प्रभु से प्रेम लगा, तो मन आनंदित हो गया।
28अहम् भाव को छोड़ने से नित्य खुशियाँ मिल रही हैं।
29जब प्रभु की रज़ा हुई तो मन में से मोह मिट गया, वह कृपा करके हृदय घर में आ गया।
30प्रभु के बिना अनेक श्रृंगार किए, परन्तु उसके चरणों में स्थान नहीं मिल सका।
31जब प्रभु की इच्छा हुई तो हार, डोर, रस, पाट-पटंबर सब श्रृंगार हो गए।
32गुरु नानक का कथन है कि गुरु से मिलाप हुआ तो पति-प्रभु को हृदय में पा लिया॥१६॥
33बारह महीने, ऋतुएँ, तिथि एवं वार भले हैं। घड़ी, मुहूर्त, पल भी प्रशंसनीय है और सच्चा प्रभु सहज-स्वभाव ही मिल जाता है।
34प्यारे प्रभु को मिलकर सभी कार्य संवर जाते हैं और कर्ता-प्रभु सब विधियाँ जानता है।
35जिसे प्रभु शुभ गुणों से श्रृंगार देता है वही प्यारी है और प्रभु मिलन में आनंद प्राप्त करती है।
36यदि प्रभु रमण करे तो हृदय-घर रूपी सेज सुन्दर हो जाती है, जिस गुरुमुख के मस्तक पर उत्तम भाग्य होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं