सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1108 · Raag Tukhaari · Guru Nanak Dev Ji

1अगर प्रियतम घर लौट आए तो मन यूं खिल जाता है जैसे वनों-मरुस्थलों में फल-फूल खिल जाते हैं।

2अगर पति-प्रभु घर नहीं आता तो जीव-स्त्री क्योंकर सुख पा सकती है, विरह के दुःख में शरीर टूटने लगता है।

3आम के पेड़ पर कोयल मीठे बोल बोलती है, प्रभु बिन मन का दु:ख और असह्य बन जाता है।

4भँवरा फूलों पर मंडराता रहता है, हे माँ ! प्रभु बिन जीना तो मृत्यु के समान है।

5गुरु नानक का कथन है कि अगर पति-प्रभु को जीव-स्त्री पा ले तो चैत्र माह को सहज-सुख पा सकती है॥ ५॥

6वैसाख का महीना भला है, प्रकृति सुन्दर वेष धारण कर लेती है।

7जीव-स्त्री द्वार पर पति-प्रभु को देखती है और विनय करती है कि दया करके घर आओ।

8हे प्यारे ! घर चले आओ, तू ही दुस्तर संसार-सागर से पार करवा सकता है और तेरे बिना तो मेरा कौड़ी भर मोल नहीं है।

9हे प्रभु ! अगर तुझे भा जाऊँ तो मैं अमूल्य हो जाऊँ, हे प्रियतम ! अपने दर्शन प्रदान करो।

10मैं तुझे अपने से दूर न समझू अपितु अंतर्मन में ही अनुभूति करूँ, तेरा महल पहचान लूं।

11गुरु नानक का कथन है कि वैसाख में प्रभु को वही पाता है, जिसकी सुरति शब्द-गुरु में लगकर मन प्रसन्न हो गया है॥ ६॥

12ज्येष्ठ का महीना भला है, इसमें प्रियतम कैसे विस्मृत हो सकता है।

13भट्टी की मानिंद भूमि तपने लगती है, जीव रूपी नारी विनय करती है।

14गुण गाती है ताकि गुण गाते हुए प्रभु को भा जाए।

15वह अलिप्त प्रभु सच्चे महल में रहता है, अगर आने की अनुमति दे तो आ जाऊँ।

16हे प्रभु ! विनम्र एवं असहाय जीव-स्त्री तेरे बिना महल में कैसे सुख पा सकती है।

17गुरु नानक का कथन है कि ज्येष्ठ के महीने में प्रभु-कृपा हो जाए तो उस जैसी ही बन जाती है और शुभ-गुणों से गुणवान बन जाती है॥ ७॥

18आषाढ़ का महीना भला है, गगन में सूर्य तपता है,

19धरती दुख सहन करती है, इतनी गर्मी पड़ती है कि वह जलकर सूख जाती है।

20अग्नि रूपी सूर्य जल को सुखा देता है, खुद तो जलता ही है, मगर अपने काम में हार नहीं मानता।

21उसका रथ फिरता रहता है, जीव-स्त्री उसकी गर्मी से बचने के लिए छाया ढूंढती है, टिड्डे सूनी जमीन पर आवाजें निकालते रहते हैं।

22जो अवगुणों की गठरी बांधकर चली जाती है, उसे आगे दुख ही प्राप्त होता है, मगर सुख वही पाता है, जो परम-सत्य का चिंतन करता है।

23गुरु नानक का कथन है कि जिसे यह मन दिया है, उसका जन्म-मरण भी प्रभु के साथ है॥ ८॥

24हे मन ! सावन का मास सरस है, बादलों के बरसने का मौसम आ जाता है।

25मेरे तन-मन को परदेस जाने वाला प्रियतम-प्रभु ही रुचता है।

26अगर प्रियतम घर नहीं आता तो उसके बिना मरने के समान है और बिजली चमक-चमक कर डराती है।

27हे माँ ! सेज अकेली है, उसके बिना दुखी हूँ और जुदाई का दुख मरने के समान है।

28प्रभु बिना नीद-भूख भी भला कैसी है, शरीर पर कोई वस्त्र भी अच्छा नहीं लगता।

29गुरु नानक का कथन है कि वही सुहागिन है जो पति-प्रभु के संग लीन रहती है॥ ९॥

30भादों के महीने में भ्रम में भूली यौवन में मस्त जीव रूपी नारी पछताती है।

31आनंदमय बरसात के मौसम में जल-थल पानी से भर जाते हैं,

32काली रात में मेघ बरसते हैं, मेंढक-मोर बोलते हैं, जीव रूपी नारी को भला कैसे सुख हो सकता है।

33पपीहा प्रिय-प्रिय बोलता है और सांप डंसते रहते हैं।

34मच्छर काटते रहते हैं, सरोवर जल से भर जाते हैं, मगर प्रभु के बिना सुख कैसे प्राप्त हो सकता है।

35गुरु नानक का कथन है कि अपने गुरु से पूछकर वहाँ चले जाना चाहिए, जहाँ प्रभु है॥ १०॥

36आश्विन के महीने में हे प्रियतम-प्रभु ! तुम चले आओ, क्योंकि जीव-स्त्री चिंता में मर रही है,

37अगर प्रभु मिलाप करे तो ही मिलन होता है, अन्यथा द्वैत-भावना में विचलित होती है।

38झुठ में लिप्त रहने के कारण नष्ट हो गई है, तभी प्रियतम ने त्याग दिया है, अब सरकण्डे में भी फूल आ चुके हैं (अर्थात् यौवन समाप्त हो गया और बुढ़ापा आ गया)

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं