सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1107 · Raag Tukhaari

1तुखारी छंत महला १ बारह माहा

2वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

3हे ईश्वर ! तुम सुनो, हर जीव अपने पूर्व (शुभाशुभ) कर्मानुसार सुख-दुःख पा रहा जो तुम देते हो, सब भला ही है।

4जब सब रचना तेरी है तो इसमें मेरी कोई गति नहीं, घड़ी भर जीना असंभव है।

5प्रियतम बिना जीव-स्त्री दुखी है, कोई उसका साथी नहीं गुरु के माध्यम से ही वह अमृतपान कर सकती है।

6हम सब निराकार की रचना में रचे हुए हैं प्रभु को मन में बसा लेना ही शुभ कर्म है।

7गुरु नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जीव-स्त्री तेरा रास्ता निहार रही है॥१॥

8(मन रूपी) चातक प्रिय-प्रिय बोलता है, (जीभ रूपी) कोयल मीठे बोल बोलती है।

9प्रभु में अनुरक्त जीव-स्त्री सभी आनंद-रस प्राप्त करती है।

10प्रभु में अनुरक्त भी वही जीव-स्त्री है, जो उसे अच्छी लगती है और वही सुहागिन नारी है।

11नौ द्वार बनाकर शरीर के ऊँचे महल (दसम द्वार) में प्रभु का निवास है।

12हे प्रभु ! सब तेरा है, तू मेरा प्रियतम है, मैं दिन-रात तेरे रंग में लीन रहती हूँ।

13गुरु नानक का कथन है कि (मन रूपी) चातक प्रिय-प्रिय गाता है, (जीभ रूपी) कोयल मीठे बोलों में उसके गुण गाती है॥ २॥

14हे प्रभु ! तुम सुनो, अपने प्रियतम के आनंद में भीगी एवं

15मन-तन में भी उसके गुणों में लीन जीव-स्त्री पल भर भी विस्मृत नहीं करती।

16वह पल भर भी कैसे भुला सकती है, तुझ पर कुर्बान है और तेरे गुण गाकर जीवन पा रही है।

17(जीव-स्त्री की विनती है कि) हे प्रभु ! तेरे सिवा मेरा कोई नहीं, तेरे अलावा कौन हमदर्द है, तेरे बिना जिया नहीं जा सकता।

18प्रभु-चरणों का आसरा लिया तो शरीर पावन हो गया।

19गुरु नानक का कथन है कि उसकी दीर्घ-दृष्टि से सुख की अनुभूति होती है और गुरु-उपदेश से मन को संतोष प्राप्त होता है।॥ ३॥

20सुहवनी बूंद की अमृत धारा बरस रही है,

21हरि से प्रीत बनी तो सहज-स्वभाव वह सज्जन-प्रभु मिल गया।

22जब प्रभु चाहता है तो वह मन-मंदिर में आ बसता है, तब जीव-स्त्री उसके गुणगान में ही लीन रहती है।

23हर सुहागिन के हृदय-घर में पति-प्रभु रमण कर रहा है, तो प्रियतम ने मुझे क्यों विस्मृत किया हुआ है।

24बादल छा कर बरस रहे हैं और मन-तन में उसकी स्मृति व प्रेम की सुखद अनुभूति हो रही है।

25गुरु नानक का कथन है कि जब पति-प्रभु कृपा करके हृदय-घर में बस जाता है तो अमृतवाणी बरसने लगती है॥ ४॥

26चैत्र माह को वसंत ऋतु खिली होती है, फूलों पर मंडराते भेंवरे सुहावने लगते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं