सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1106 · Raag Maaroo

1रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की

2ੴ सतिगुर प्रसादि॥

3चन्द्रमा स्वर द्वारा पूरक करके सातवाँ चक्र भेद दिया और सातवें चक्र में अनाहत नाद वज दिया, फिर सोलह बार ॐ का उच्चारण करके सूर्य स्वर द्वारा रेचक किया।

4जब मन के बल को तोड़कर उसे बलहीन कर दिया, भटकते मन को स्थिर किया और चंचल मन को सुन्दर बनाया तो ही मन ने नामामृत का पान किया।॥ १॥

5हे मेरे मन ! जब जगत् के मूल परमेश्वर के गुणों का बखान किया तो

6तेरी दुविधा मिट गई और तेरी समदर्शी दृष्टि हो गई॥ १॥ रहाउ॥

7जब आराधना योग्य परमेश्वर की आराधना की एवं श्रद्धेय प्रभु में श्रद्धा धारण की तो जैसे जल जल में विलीन हो जाता है, वैसे ही परम-सत्य में विलीन हो गया।

8जयदेव कहता है कि ब्रह्म का चिंतन करके निर्वाण पद पाया है और उसमें लिवलीन होकर उसे पा लिया है॥ २॥ १॥

9कबीरु॥ मारू॥

10हे मन ! राम का भजन-सुमिरन कर ले नहीं तो पछताएगा।

11पापी मन लोभ ही करता रहता है लेकिन आजकल में मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा॥ १॥ रहाउ॥

12लालच में फँसकर तूने अपना जन्म व्यर्थ गंवा लिया है और माया के भ्रम ने तुझे भुलाया हुआ है।

13धन एवं यौवन का घमण्ड मत करो, तू कागज की तरह गल जाएगा॥ १॥

14जब यम आकर केशों से पकड़कर तुझे पटका कर मारेगा, उस दिन तेरा कुछ भी वश नहीं चलना ।

15तूने कभी भगवान् का भजन-सिमरन नहीं किया और न ही कभी जीवों पर दया की है, तब तू अपने मुँह पर चोटें ही खाएगा॥ २॥

16जब धर्मराज तेरे कर्मों का लेखा-जोखा माँगेगा, तो तू क्या मुँह लेकर उसके पास जाएगा।

17कबीर जी कहते हैं केि हे सज्जनो, जरा ध्यानपूर्वक सुनो; साधु-संगति में ही संसार-सागर से पार हो सकोगे॥ ३॥ १॥

18रागु मारू बाणी रविदास जीउ की

19ੴ सतिगुर प्रसादि॥

20हे प्यारे प्रभु ! तेरे बिना ऐसी कृपा कौन कर सकता है,

21हे गुँसाई ! तू गरीब-नवाज है और मुझ दीन पर तूने छत्र धर दिया है॥ १॥ रहाउ॥

22जिसकी छूत जगत् को लग जाती है अर्थात् जिसे दुनिया अछूत समझती है, उस पर तू ही कृपा करता है।

23मेरा गोबिंद नीच को भी ऊँचा बना देता है और वह किसी से नहीं डरता॥ १॥

24उसकी अनुकंपा से नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना एवं सैन इत्यादि भी संसार-समुद्र से पार हो गए हैं।

25रविदास जी कहते हैं, हे सज्जनो ! मेरी बात जरा ध्यानपूर्वक सुनो, ईश्वर की रज़ा से सभी मनोरथ पूरे हो सकते हैं।॥ २॥ १॥

26मारू॥

27जिसके वश में सुखों का सागर कल्पवृक्ष, चिंतामणि एवं कामधेनु हैं;

28धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चार पदार्थ, आठ महासिद्धियों एवं नो निधियाँ भी उस ईश्वर के हाथ में ही हैं॥ १॥

29हे भाई ! जिह्मा से तुम भगवान् का नाम तो जपते ही नहीं,

30अन्य सभी वचन एवं व्यर्थ रचना को छोड़ कर प्रभु का भजन कर ले। १॥ रहाउ॥

31अनेक आख्यान, पुराणों, वेदों एवं विधियों तथा चौंतीस अक्षरों में लिखे गए शास्त्रों का विचार करके

32व्यास जी ने यही बताया है कि राम नाम के बराबर कोई परमार्थ नहीं है॥ २॥

33सहज-स्वभाव समाधि में रत होकर दुख-तकलीफों से रहित हो गए हैं और अहोभाग्य से ईश्वर में लगन लग गई है।

34रविदास जी कहते हैं कि दास की मति जग से विरक्त हो गई है, जिससे जन्म-मरण का भय भाग गया है।३॥ २॥ १५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं