सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1105 · Raag Maaroo · Bhagat Kabeer Ji

1हे राजन ! तुम्हारे सुन्दर घर में कौन आए?

2मैंने विदुर का ऐसा प्रेम देखा है कि वह गरीब ही मुझे अच्छा लगता है॥ १॥ रहाउ॥

3हाथी इत्यादि (सत्ता) देखकर तुम भ्रम में ही भूले हुए हो किन्तु भगवान की महिमा को नहीं जाना।

4तुम्हारे दूध की अपेक्षा विदुर का पानी मैंने अमृत समान माना है॥ १॥

5मुझे उसका साग (तेरी) खीर के समान स्वादिष्ट प्रतीत हुआ और भगवान् का गुणगान करते हुए रात्रि व्यतीत हुई।

6कबीर का मालिक बड़ा आनंदी एवं विचित्र लीलाएँ करने वाला है, वह किसी की ऊँची अथवा नीच जाति को नहीं मानता॥ २॥ ६॥

7श्लोक कबीर।

8गगन तक युद्ध का विगुल बज चुका है और नगाड़े पर भी चोट हो गई है।

9शूरवीरों ने रणभूमि में तैयारी कर ली है और अब उनके लिए शत्रुओं से जूझने का समय आ गया है॥ १॥

10सच्चा शूरवीर वही समझा जाता है जो अपने धर्म एवं मासूमों के लिए लड़ता है।

11धर्म एवं गरीबों की खातिर चाहे वह अंग-अंग से कट कर मर जाए किन्तु वह रणभूमि को कदापि नहीं छोड़ता॥ २॥ २॥

12कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की

13ੴ सतिगुर प्रसादि॥

14जब हम पति-प्रभु की शरण में आ गए तो चारों मुक्तियाँ एवं चारों सिद्धियाँ हमें प्राप्त हो गई।

15जब मुक्ति प्राप्त हो गई तो चारों युगों में विख्यात हो गया और परमात्मा ने यश एवं कीर्ति का छत्र हमारे सिर पर झुला दिया है॥ १॥

16राम का नाम जपकर भला कौन-कौन पार नहीं हुआ ?

17जिसने भी गुरु का उपदेश सुना, साधु-पुरुषों की संगति की है, उसका ही नाम भक्त पड़ गया है॥ १॥ रहाउ॥

18जिस पर शंख, चक्र, माला एवं तिलक शोभायमान है, उस परमात्मा के प्रताप को देखकर यम भी डरकर भाग गए हैं।

19राम के बल से निर्भय हो गए हैं और जन्म-मरण का दुख मिट गया है॥ २॥

20भगवान् ने राजा अंबरीष को अभय-पद प्रदान किया था और प्रभु के वर से ही विभीषण ने अधिकतर समय लंका पर राज्य किया।

21उस ठाकुर जी ने गरीब सुदामा को नौ निधियाँ प्रदान की थीं और भक्त धुव को अटल कर दिया जो अभी तक कायम है॥ ३॥

22अपने भक्त प्रहलाद के लिए नृसिंह अवतार धारण करके दुष्ट हिरण्यकशिपु का वध किया।

23नामदेव कहते हैं कि ईश्वर तो भक्ति के वश में है और आज भी राजा बलि के द्वार पर खड़ा है।४॥ १॥

24मारू कबीर जीउ॥

25अरे पगले ! तूने अपना धर्म ही भुला दिया है।

26पशु की तरह पेट भरकर तू गहरी नीद सोया रहता है और मनुष्य-जन्म व्यर्थ ही गंवा दिया है॥ १॥ रहाउ॥

27साधु-पुरुषों की कभी संगति ही नहीं की, अपितु जग के झूठे धेधों में ही लीन रहा।

28कुते, सूअर एवं कौए की तरह मनुष्य भटकता रहता है और अंत में फिर संसार से चल देता है॥ १॥

29मनुष्य स्वयं को बड़ा समझता है किन्तु अन्य लोगों को छोटे से छोटा समझता है।

30अपने मन, वचन एवं कर्म द्वारा ऐसा करने वालों को मैंने नरक में ही जाते देखा है॥ २॥

31कामी, क्रोधी, चालवाज एवं छल-कपट करने वाले सभी निकम्मे हैं,

32उन्होंने राम का तो कभी स्मरण नहीं किया, अपितु दूसरों की निंदा करते हुए अपना जन्म व्यर्थ ही व्यतीत कर दिया है॥ ३॥

33कबीर जी कहते हैं केि मूर्ख-गंवार जीव चिंतन ही नहीं करता,

34फिर राम नाम के रहस्य को जागे बिना वह कैसे पार उतर सकता है॥ ४॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं