सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1103 · Raag Maaroo · Bhagat Kabeer Ji

1राम नाम की महत्ता को जाना ही नहीं, फिर कैसे पार हो सकते हो।॥ १॥

2यज्ञ करते समय बलि देने के लिए -हत्या को तुम धर्म कहते हो, हे भाई ! फिर बताओ अधर्म क्या है?

3ऐसा करके भी तुम खुद को मुनि कहलवाते हो तो फिर कसाई केिसे कहते हो।॥ २॥

4हे मन के अन्धे ! स्वयं तो तुम कुछ समझते ही नहीं, फिर किसी अन्य को क्या ज्ञान दे सकते हो।

5तुम धन-दौलत के लिए विद्या को बेचते हो और इस तरह तुम्हारा जन्म व्यर्थ ही जा रहा है॥ ३॥

6देवर्षि नारद एवं व्यास भी यही वचन कहता है और इस संदर्भ में चाहे शुकदेव से भी विश्लेषण किया जा सकता है।

7हे भाई ! कबीर भी एक यही सत्य कहते हैं कि राम का नाम जपने से ही छुटकारा हो सकता है, अन्यथा भवसागर में ही डूबोगे॥ ४॥ १॥

8जब तक मन में से कामादिक विकारों को छोड़ा नहीं जा सकता, फिर वन में जाकर बसने से भी भगवान को कैसे पाया जा सकता है।

9जिसने अपने घर एवं वन को एक समान समझ लिया है, वही व्यक्ति संसार में पूर्ण त्यागी है॥ १॥

10राम-नाम का सिमरन करने से ही परम-सुख हासिल होता है,

11अतः अपने हृदय में ही प्रेमपूर्वक राम को जपते रहो॥ १॥ रहाउ॥

12किसी ने लम्बी जटाएँ रखकर, शरीर में भस्म का लेपन करके गुफा में निवास कर लिया है, परन्तु इसका क्या लाभ ?

13जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसने तो समझो सारे जगत् को ही जीत लिया है और वह विषय-विकारों से विरक्त हो जाता है॥ २॥

14हर कोई अपनी आँखों में सुरमा लगाता है किन्तु हरेक इन्सान की भावना में थोड़ा अन्तर अवश्य होता है।(कोई अपनी ऑखों की ज्योति बढ़ाने एवं कोई सुन्दर दिखने के लिए ऑखों में सुरमा डालता है) ।

15जिसने अपनी ऑखों में ज्ञान रूपी सुरमा डाला है, वही ऑखें वास्तव में स्वीकार होती हैं।॥ ३॥

16हे कबीर ! अब मैंने सत्य को जान लिया है, गुरु ने मुझे ज्ञान देकर समझा दिया है।

17मुझे मेरे अन्तर्मन में ही परमात्मा मिल गया है, अतः अब मेरा मन कहीं भी नहीं भटकता॥ ४॥ २॥

18जिसे ऋद्धियों-सिद्धियों पाने का ख्याल लगा हुआ है, तो उसे भला किसी से क्या वास्ता हो सकता है।

19तेरी कही बातों के बारे में क्या कहूँ? मुझे तो बात करते भी बहुत शर्म महसूस होती है॥ १॥

20जिसने राम को पा लिया है,

21उसे द्वार-द्वार पर भटकना नहीं पड़ता॥ १॥ रहाउ॥

22दो दिन व्यवहार की आशा लेकर यह झूठा जगत बहुत भटकता रहता है।

23जिसने राम-नाम रूपी जल पी लिया है, उसे पुनः कोई प्यास नहीं लगती॥ २॥

24गुरु की कृपा से जिसने इस रहस्य को बूझ लिया है, वह आशाओं को छोड़कर निर्लिप्त हो गया है।

25जब अन्तर्मन विरक्त हो गया तो उसे सब ओर सत्य ही नजर आया है॥ ३॥

26जिसने मुक्तिदाता ईश्वर का नाम जपा है, वह पार हो गया है।

27हे कबीर ! वह मनुष्य स्वर्ण की तरह हो गया है, उसका भ्रम मिट गया है और वह संसार-समुद्र से पार हो गया है॥ ४॥ ३॥

28जैसे समुद्र का पानी समुद्र में एवं लहरें नदी में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही हम परम-सत्य में समाहित हो जाएँगे।

29जब शून्य (परमात्मा) में शून्य (आत्मा) मिल जाएगा तो हम समदर्शीं पवन रूप हो जाएँगे।॥ १॥

30फिर दुनिया में हम क्योंकर आएँगे ?

31जन्म-मरण तो परमात्मा के हुक्म में ही होता है और उसके हुक्म को बूझकर उसमें ही समा जाएँगे॥ १॥ रहाउ॥

32जब पंच तत्वों (पृथ्वी, आकाश, अग्नि, पवन, जल) की रचना विनष्ट हो जाएगी तो इस तरह सब भ्रम मिट जाएगा।

33छदम् दर्शन एवं पाखण्डों को छोड़कर हम समदर्शी होकर एक ईश्वर के नाम का ध्यान करते रहेंगे। २॥

34भगवान् हमें जिधर लगाएगा, उधर ही लगे रहेंगे और वैसे ही कर्म करते रहेंगे।

35यदि परमात्मा अपनी कृपा कर दे तो गुरु के शब्द में समाहित हो जाएँगे॥ ३॥

36अगर जिन्दा रहते हुए विषय-विकारों की तरफ से मर जाओ तो मरकर पुनः जीवित बन जाओ, इस प्रकार बार-बार जन्म-मरण नहीं होगा।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं