गुरु ग्रंथ साहिब 1102 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1उसने मुझे ज्ञान रूपी राशि एवं नाम रूपी धन सौंप दिया है और मुझे इस व्यापार के योग्य बना दिया है।
2उसने गुरु के साथ सांझेदार बनाकर बिठा दिया है और मैंने सर्व सुख पा लिए हैं।
3मेरा हरि पिता सब बातों अर्थात् सर्वकला समर्थ है, (मेरी तो बस यही कामना है कि) अब वह मुझसे कभी जुदा न होए॥ २१॥
4श्लोक डखणे महला ५॥
5नानक का कथन है कि हे मनुष्य ! झूठे एवं पाखण्डी लोगों से नाता तोड़कर पक्के सज्जन संतों को ढूंढ लो।
6चूंकेि झूठे लोग तो जीते जी ही बिछुड़ जाते हैं परन्तु सज्जन संत तो मरणोपरांत भी साथ नहीं छोड़ते॥ १॥
7महला ५॥
8हे नानक ! बिजली चमकती है, अत्यंत काली घटा गरजती है, चाहे बादल बहुत बरसते हैं,
9हे नानक ! जीव-स्त्री तो प्रभु मिलन में ही शोभायमान होती है।॥ २॥
10महला ५॥
11चाहे धरती के सरोवर-नदियाँ जल से भरे हुए हों, शीतल पवन बहती हो,
12सोने की सेज हीरे-मोतियों से जड़ित हो,
13सुन्दर कपड़े एवं स्वादिष्ट भोग-पदार्थ भी हों परन्तु हे नानक ! पति-प्रभु के बिना सब दुखदायक ही प्रतीत होते हैं॥ ३॥
14पउड़ी॥
15परमात्मा ने जो कारण बनाया है, मनुष्य ने वही करना है।
16यदि प्राणी सौ यत्न करता हुआ भी भागदौड़ करता रहे, किन्तु उसे वही प्राप्त होता है, जो प्रारब्ध में लिखा होता है।
17यदि प्राणी सारी धरती पर भी घूमता रहे, फिर भी भाग्य के बिना उसे कुछ भी नहीं मिलता।
18गुरु को मिलकर जो भगवान के प्रति अदा रूपी भय मन में बसा लेता है, उसका यम का भय दूर हो जाता है।
19श्रद्धा रूपी भय धारण करने से ही प्रभु-मिलन के लिए वैराग्य उत्पन्न होता है और तब वह परमात्मा को खोजता है।
20भगवान् को खोजते-खोजते ही मन में परमानंद पैदा होता है और फिर जन्म-मरण छूट जाता है।
21उसने साधु की शरण पाकर हृदय में परमात्मा का ही ध्यान किया है।
22हे नानक ! गुरु ही नाम रूपी जहाज है, जिसे ईश्वर इस में चढ़ा देता है, उसे भवसागर से तार देता है॥ २२॥
23श्लोक महला ५॥
24सर्वप्रथम मृत्यु को कबूल करो; जीने की आशा छोड़ दो,
25सबकी चरणरज बन जाओ; हे मानव ! तो ही हमारे पास आओ॥ १॥
26महला ५॥
27अहंकार-भाव से मृत आदमी को ही जीवित समझो एवं अभिमान में जीवित को तो मृतक ही समझो।
28वही मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनकी ईश्वर से मुहब्बत लगी हुई है॥ २॥
29महला ५॥
30जिसके मन में परब्रह्म बस जाता है, कोई पीड़ा उसके निकट भी नहीं आती।
31भूख-प्यास तो उसे बिल्कुल तंग नहीं करते और यम उसके निकट ही नहीं आता॥ ३॥
32पउड़ी॥
33हे सच्चे मालिक ! तू सदैव अडोल है, तेरी कीमत आँकी नहीं जा सकती।
34सिद्ध-साधक, ज्ञानी-ध्यानी में से कौन तेरी महिमा को तौल सकता है।
35तू नष्ट करने एवं बनाने में समर्थ है, संसार की उत्पत्ति एवं प्रलय सब तेरी ही लीला है।
36तू सब कुछ करने-करवाने में समर्थ है और सब शरीरों में तू ही बोलता है।
37हे मनुष्य ! तू क्यों फिक्र करता है, जबकि परमात्मा तो सब को आहार प्रदान करता है।
38हे ईश्वर ! तू गहन-गम्भीर एवं अथाह है, तेरे गुण एवं ज्ञान अमूल्य हैं।
39मनुष्य ने तो वही काम करना है, जो परमेश्वर ने उसके लिए निश्चित कर दिया है।
40हे मालिक ! तुझसे बाहर कुछ भी नहीं है, नानक तो तेरे ही गुण गाता हैं॥ २३ ॥ १॥ २॥
41रागु मारू बाणी कबीर जीउ की
42ੴ सतिगुर प्रसादि॥
43अरे पण्डित ! तुम किस कुमति में लग चुके हो।
44हे अभागे, अगर राम का नाम नहीं जपा तो पूरे परिवार सहित डूब जाओगे॥ १॥ रहाउ॥
45वेद एवं पुराणों को पढ़ने का तुझे क्या फायदा ? यह तो यूं ही व्यर्थ है, जैसे गधे पर चन्दन का भार लादा होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं