गुरु ग्रंथ साहिब 1101 · Raag Maaroo
1महला ५॥
2अगर कोई मनुष्य समूची धरती का मालिक बन जाए, समस्त सुख भोगता रहे,
3मगर हे नानक ! परमात्मा के नाम बिना यह सब रोग ही हैं और वह एक मृतक समान हैं।॥ २॥
4महला २॥
5हे जीव ! ईश्वर को ही तू चाह, उसे ही अपना शुभचिंतक बना।
6हे नानक ! वह हर आशा पूरी करने वाला है, किसी मनुष्य से माँगने पर तो लज्जित होना पड़ता है॥ ३॥
7पउड़ी॥
8केवल ईश्वर ही निश्चल है, अगम्य एवं असीम है।
9नाम-रूपी सुखों की निधि निश्चल है, जिसे स्मरण करने से भगवान् मिल जाता है।
10प्रभु का कीर्तिगान सदा स्थिर रहने वाला है, गुरुमुख प्रभु के ही गुण गाता है।
11सत्य, धर्म एवं तप सदैव रहने वाला है, दिन-रात परमात्मा की आराधना करो।
12निश्चल दया, धर्म एवं तप उसे ही मिलता है, जिसके भाग्य में लिखा होता है।
13माथे पर लिखा हुआ भाग्य सदा अटल है, वह टालने पर भी टाला नहीं जा सकता।
14साधु महापुरुषों की संगति एवं गुरु-साधु का वचन सदा अटल है।
15जिनके भाग्य में प्रारम्भ से लिखा हुआ है, उन्होंने सदा भगवान् की आराधना की है॥ १६॥
16श्लोक डखणे महला ५॥
17जो स्वयं डूब रहा है, वह किसी अन्य को कैसे पार करवा सकता है।
18हे नानक ! ईश्वर की स्मृति में लीन रहने वाला खुद तो जगत् से तैरता ही है, दूसरों का भी उद्धार करवा देता है।॥१॥
19महला ५॥
20जहाँ कोई मेरे प्रियतम का नाम कथन करता या सुनता है, मैं वहाँ चला जाता हूँ,
21हे नानक ! मुझे प्रियतम प्रभु इतना पसंद है कि उसके दर्शन से ही फूल की तरह खिल जाता हँ॥ २॥
22महला ५॥
23हे जीव ! पुत्र एवं पत्नी के स्नेह में फँसकर तू क्यों कहता है कि यह मेरी (पत्नी) है, यह मेरा (पुत्र) है।
24हे नानक ! परमात्मा के नाम से विहीन शरीर की कोई मजबूत नीव नहीं होती अर्थात् कभी भी नाश हो सकती है॥ ३॥
25पउड़ी॥
26इन आँखों से गुरु का दर्शन करता हूँ, गुरु-चरणों में शीश निवाता हूँ।
27अपने पैरों से गुरु के मार्ग पर चलता और हाथों से उसे पंखा झुलाता हूँ।
28हृदय में अकालमूर्ति (ईश्वर) का मनन करता हूँ और दिन-रात उसका जाप करने में लीन हूँ।
29समर्थ गुरु के भरोसे पर मैंने अपनापन छोड़ दिया है।
30गुरु ने मुझे हरि-नाम रूपी सुखों का भण्डार प्रदान किया है, जिससे सारा दुख दूर हो गया है।
31हे मेरे भाइयो ! अकथ प्रभु का नाम मेरे पास है, आप भी उसे सेवन करो एवं आनंद प्राप्त करो।
32सदा गुरु की कथा करो, नाम, दान एवं स्नान-इन शुभ कर्मो को हृदय में बसा लो।
33प्रभु को पाकर मन में परमानंद उत्पन्न हो गया है और यम का भय भी दूर हो गया है॥ २०॥
34श्लोक डखणे महला ५॥
35ये ऑखें तो प्रभु से ही लग चुकी हैं और उसे देखकर तृप्त नहीं होती।
36वह मालिक सब में मौजूद है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई दृष्टिगत नहीं होता।॥ १॥
37महला ५॥
38संत-महापुरुषों की कथाएँ सुखदायक रास्ते हैं,
39हे नानक ! ये (शिक्षादायक कथाएँ) उन्हें ही मिलती हैं, जिनका उत्तम भाग्य होता है॥ २॥
40महला ५॥
41पहाड़ों, सरोवर, मारूस्थल, भूमि, वन, फल, गुफाओं,
42आकाश, पाताल में सब ईश्वर ही व्याप्त है।
43हे नानक ! हम तो उसे देखकर ही जी रहे हैं, जिसने सबको एक सूत्र में पिरोया हुआ है।॥ ३॥
44पउड़ी॥
45परमात्मा ही हमारा माता-पेिता है और वही हमारा प्रतिपालक है।
46वही मेरी देखभाल करता है और हम उसके ही बालक हैं।
47वह सहज-स्वभाव ही जीवन रूपी खेल खेलाता है और इसमें वह कभी आलस्य नहीं करता।
48वह मेरा कोई भी अवगुण याद नहीं करता, अपितु अपने गले से लगा लेता है।
49जो कुछ भी मुँह से माँगता हूँ वही दे देता है, मेरा हरि पिता सब सुख देने वाला है?
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं