सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 109 · Raag Maajh

1मांझ महला ५ ॥

2यदि कोई व्यक्ति झूठी माया की याचना करे तो

3उसे मृत्युकाल में एक क्षण भी नहीं लगता।

4जो व्यक्ति पारब्रह्म प्रभु की सदैव भक्ति करता रहता है, वह गुरु से मिलकर सदैव जीवन प्राप्त कर लेता है॥१॥

5जिसका मन प्रभु की भक्ति में मग्न है,

6वह दिन-रात प्रभु की कीर्ति गायन करता है और सदैव मग्न रहता है।

7जिसकी किस्मत में नाम की देन लेने का लेख विद्यमान है, उसे ही भुजा से पकड़ कर प्रभु अपने साथ मिला लेता है॥२॥

8हरि के चरण कमल उसके भक्तों के हृदय में बसते हैं।

9महान परमेश्वर की दया के अलावा सारे ठगे जाते हैं।

10जो व्यक्ति संतों की चरण-धूलि की नित्य कामना करते रहते हैं, उन्हें संतों द्वारा सत्य प्रभु का नाम रूपी आभूषण मिल जाता है।॥३॥

11उठते-बैठते हर वक्त हमें भगवान की महिमा-स्तुति करते रहना चाहिए,

12भगवान का सिमरन करने से अटल प्रभु मिल जाता है।

13हे नानक ! परमात्मा उस पर दयालु हुआ है। हे प्रभु ! तुम जो कुछ करते हो, मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ॥४॥ ४३॥ ५०॥

14रागु माझ असटपदीआ महला १ घरु १

15ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

16ईश्वर के हुक्म द्वारा सभी गुरु के शब्द में मग्न हैं

17और परमात्मा के सत्य दरबार में उसकी उपस्थिति में आमंत्रित किए जाते हैं।

18हे मेरे मालिक ! तू दीनदयाल एवं सदैव सत्य है और तेरे सत्य से मेरा मन प्रसन्न हो गया है॥ १॥

19मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जिन्होंने शब्द द्वारा अपना जीवन सुन्दर बना लिया है।

20प्रभु का अमृत नाम सदा ही सुख देने वाला है। गुरु के उपदेश द्वारा मैंने प्रभु के नाम को अपने मन में बसा लिया है॥ १॥ रहाउ॥

21न ही कोई मेरा है, न ही मैं किसी का हूँ।

22तीनों लोकों का स्वामी सत्य परमात्मा ही मेरा है।

23अनेक जीव अहंकार करके प्राण त्याग गए हैं। दुष्कर्म करके प्राणी को बड़ा पश्चाताप होता है॥ २॥

24जो परमात्मा के हुक्म को पहचानता है, वही उसका यशोगान करता है।

25वह गुरु के शब्द द्वारा नाम रूपी परवाना अपने साथ लेकर दरबार में जाता है।

26सत्य प्रभु के दरबार में समस्त जीवों के कर्मों का लेखा होता है। वहाँ वहीं व्यक्ति मुक्त होते हैं, जो नाम द्वारा अपना जीवन सुन्दर बना लेते हैं।॥ ३॥

27मनमुख व्यक्ति को कहीं भी सुख नहीं मिलता।

28मृत्यु के द्वार पर बंधा हुआ वह चोटें खाता है।

29वहाँ नाम के अलावा मनुष्य का कोई मित्र अथवा सज्जन नहीं होता। नाम सिमरन करने वाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है॥ ४॥

30झूठे शाक्त को सत्य उत्तम नहीं लगता।

31वह दुविधा में फँसा होने के कारण जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है।

32जीव की किस्मत को कोई मिटा नहीं सकता। गुरु की दया से ही मनुष्य मोक्ष पाता है॥ ५॥

33जिस जीव-स्त्री ने अपने पीहर (इहलोक) में अपने मालिक-प्रभु को नहीं समझा,

34वह झूठी प्रभु से जुदा हुई ऊँची ऊँची विलाप करती है।

35उस अवगुणों की ठगी हुई जीव-स्त्री को प्रभु के महल में स्थान नहीं मिलता। गुणों का स्वामी प्रभु स्वयं ही जीव के अवगुणों को क्षमा कर देता है॥ ६॥

36जिस जीव-स्त्री ने अपने पीहर (मृत्युलोक) में अपने पति-प्रभु को समझ लिया है,

37वह गुरु के माध्यम से परम तत्त्व अर्थात् प्रभु के गुणों को समझ लेती है।

38प्रभु उसके जन्म-मरण के चक्र को मिटा देता है। तदुपरांत वह सत्य प्रभु के नाम में लीन रहती है॥ ७॥

39गुरमुख प्रभु के गुणों को स्वयं समझता है और दूसरों से अकथनीय प्रभु की लीला एवं उसके गुणों की कथा करवाता है।

40सच्चे ठाकुर प्रभु को सत्य नाम ही अच्छा लगता है।

41हे नानक ! वह सत्य प्रभु के समक्ष सच्ची प्रार्थना करता है कि उसे सत्य नाम मिले ताकि वह उसकी महिमा करता रहे ॥ ८॥ १॥

42माझ महला ३ घरु १ ॥

43उनकी दया से, हम सच्चे गुरु से मिलते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं