गुरु ग्रंथ साहिब 1097 · Raag Maaroo
1महला ५॥
2हे मालिक ! तू मेरी वेदना को जानता ही है केि मुझ जैसे दुखियारे को कितने ही दर्द लगे हुए हैं।
3हे प्यारे ! बेशक मैं लाखों ही उपचार जानता होऊँ तो भी तेरा दर्शन पाकर ही जीवित रह सकता हूँ॥ २॥
4महला ५॥
5जीवन रूपी नदिया का किनारा ध्वस्त होता जा रहा है और मैंने इस नदिया के बहाव में बहते लोगों को देखा है,
6मगर जिन्हें सतिगुरु मिल गया है, वही इससे सुरक्षित रहे हैं।॥३॥
7पउड़ी॥
8जिसे तुझे पाने की लालसा लगी हुई है, उसे कोई दुख-क्लेश नहीं लगता।
9जिस ने गुरु के सान्निध्य में ईश्वर को बूझ लिया है, वह उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम इन चारों दिशाओं में विख्यात हो गया है।
10जो आदमी उसकी शरण में आता है, उसे देखकर पाप भी थर-थर कांपने लगते हैं।
11जो गुरु की चरण-धूलि में स्नान करता है, उसकी जन्म-जन्मांतर की मैल निवृत्त हो जाती है।
12जिसने ईश्वरेच्छा को सहर्ष स्वीकार केिया है, उसे कोई शोक-संताप नहीं लगता।
13हे परमात्मा ! तू सब जीवों का मित्र है और तू स्वयं ही सबको जानता है।
14विश्व में जितना परमात्मा का प्रताप है, वैसी ही उसके भक्तजनों की शोभा है।
15समूचे जगत् में उसने भक्तों का यश फैला दिया है और उनकी कीतिं से ही परमात्मा जाना जाता है॥ ८॥
16डखणे महला ५॥
17जिनके पीछे में गई थी, अब ये मेरे ही पीछे फिरते हैं।
18जिनकी मैंने आशा की थी, उन्होंने मेरी आशा की हुई है॥ १॥
19महला ५॥
20जैसे उड़ती हुई मक्खी घूम-घूम कर गीली-गीली गुड़ की डली के पास आती है और उससे चिपक कर ही मर जाती है,
21वैसे ही जो मनुष्य माया के निकट होकर बैठे हैं, वे माया-जाल में फंस गए हैं, परन्तु भाग्यशाली इससे उबर गए हैं। २॥
22महला ५॥
23हमने तो सब में ईश्वर को ही देखा है और कोई भी उससे खाली नहीं जाना जाता है।
24वह सखी भाग्यशाली है, जिसने मेरे सज्जन प्रभु के संग रमण किया है। ३॥
25पउड़ी॥
26अगर प्रभु चाहता है तो यह ढाढी उसके ही गुण गाता है।
27मेरा प्रभु सदा रहने वाला शाश्वत है, परन्तु अन्य सभी जन्म-मरण में पड़े हुए हैं।
28हे मालिक ! मैं वही दान माँगता हूँ, जिससे मेरी सारी लालसा दूर हो जाए।
29हे प्रभु जी ! अपना दर्शन दो, जिससे यह ढाढी तृप्त हो जाए।
30जब दातार प्रभु ने प्रार्थना सुनी तो उसने ढाढी को अपने महल में बुला लिया।
31प्रभु के दर्शन करते ही दुख एवं भूख मिट गई, अब ढाढी को कुछ माँगना याद ही नहीं आता।
32प्रभु-चरणों में लगकर सभी कामनाएँ पूरी हो गई हैं।
33उस परमपुरुष प्रभु ने मुझ गुणविहीन को क्षमा कर दिया है॥ ६॥
34डखणे महला ५॥
35हे मानव देह ! प्राण पखेरू होते ही जब आत्मा से नाता टूट जाता है तो तू मिट्टी हो जाती है। फिर तुम आत्मा से सूनी होकर पति-प्रभु को जान नहीं सकती।
36कामादिक दुष्ट विकारों से ही तुम्हारा प्रेम बना हुआ है, फिर भला किस गुण के कारण प्रभु-प्रेम का आनंद ले सकती हो॥ १॥
37महला ५॥
38हे नानक ! जिसके बिना घड़ी भर भी जीवित रहा नहीं जाता, जिसे भूलने से थोड़ा-सा भी निर्वाह नहीं होता,
39उससे मन में क्यों रूठा जाए, जिसे हर वक्त हमारी चिंता लगी रहती है॥ २॥
40महला ५॥
41जो परब्रह्म के रंग में लीन हो जाते हैं, उनका मन-तन गुलाल जैसा अति लाल हो जाता है।
42हे नानक ! प्रभु-नाम के बिना अन्य जितने भी ख्याल हैं, वे मन को मैला करने वाले हैं॥ ३॥
43पउड़ी॥
44हे परमात्मा ! जब तू मेरा मित्र है तो फिर मुझे किसी प्रकार की क्या चिन्ता है।
45जिन काम, क्रोध रूपी ठगों ने संसार को ठग लिया है, तूने उन्हें मार कर भगा दिया है।
46गुरु ने मुझे भयानक संसार-सागर से पार लंघा दिया है और मैंने सारा दुनियावी झगड़ा ही जीत लिया है।
47गुरु के उपदेशानुसार जगत् रूपी बड़े अखाड़े में सभी रसों का भोग कर रहा हूँ।
48जब ईश्वर हमारा बन गया तो उसने सब इन्द्रियों को वश में कर दिया।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं