गुरु ग्रंथ साहिब 1094 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1उसका ही जन्म सफल है, जो अपनी कुल का उद्धार करता है।
2आगे परलोक में किसी की जाति नहीं पूछी जाती, अपितु शुभ कर्म एवं शब्द का चिंतन ही श्रेष्ठ माना जाता है।
3अन्य पढ़ना, आचरण करना सब झूठ ही झूठ है और विषय-विकारों से प्रेम मात्र झूठ ही है।
4स्वेच्छाचारी के मन को सुख नहीं मिलता और उसका जन्म व्यर्थ ही बर्याद होता है।
5हे नानक ! गुरु के अपार प्रेम द्वारा हरि-नाम में लीन रहने वाले संसार-सागर से उबर गए हैं।॥ २॥
6पउड़ी।
7ईश्वर स्वयं ही संसार बनाता है, स्वयं ही संभाल करता है और एकमात्र वही सत्य है।
8जो मालिक के हुक्म को नहीं समझता, वह आदमी कच्चा है।
9जिधर उपयुक्त लगता है, उधर ही सच्चा प्रभु लगा देता है।
10सबका मालिक एक ही है और शब्द-गुरु द्वारा ही जीव उसमें रचता है।
11गुरु के सान्निध्य में सदा उसका स्तुतिगान करो, सभी जीव उसके याचक हैं।
12हे नानक ! जैसे परमात्मा जीवों को नचाता है, वैसे ही वे नाचते हैं।॥ २२॥ १॥ शुद्ध॥
13मारू वार महला ५ डखणे मः ५
14ੴ सतिगुर प्रसादि॥
15हे मेरे सज्जन प्रभु ! अगर तू कहे तो मैं अपना शीश उतारकर तुझे भेंट कर दूँ।
16मेरे नयन तरस रहे हैं, कब तेरा दीदार होगा। १॥
17महला ५॥
18तेरे साथ ही मेरा प्रेम है, अन्य सब प्रेम झूठे ही देखे हैं।
19जब तक प्रिय-प्रभु को न देख लूं, तब तक सभी कपड़े एवं भोग भयानक ही लगते हैं॥ २॥
20महला ५॥
21हे स्वामी ! मैं सुबह उठती हूँ, ताकि तेरा दीदार पा सकूं।
22तुझे देखे बिना यह काजल, हार, पान का रस सब कुछ मेरे लिए धूल के समान हैं॥ ३॥
23पउड़ी॥
24हे परमात्मा ! तू ही सच्चा मालिक है, तूने सब परम सत्य ही धारण किया हुआ है।
25इस संसार का निर्माण करके तूने गुरुमुखों के लिए भक्ति एवं सिमरन करने का स्थान बनाया है।
26ईश्वर की आज्ञा से ही वेदों की उत्पति हुई, जिन्होंने पाप-पुण्य का विचार किया।
27ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव को बनाकर माया के तीन गुणों का विस्तार किया।
28नवखण्ड पृथ्वी का निर्माण करके परमात्मा ने उसे अनेक रंगों से सुन्दर बना दिया।
29अनेक प्रकार के जीवों को पैदा करके उनमें जीवन-शक्ति स्थापित कर दी।
30हे सच्चे सृजनहार ! कोई भी तेरा अन्त (रहस्य) नहीं जानता।
31तू सब युक्तियाँ जानता है और स्वयं ही गुरुमुख का उद्धार करता है॥ १॥
32डखणे महला ५॥
33हे प्रभु ! अगर तू हमारा मित्र है तो हमें थोड़ी देर के लिए भी अपने से जुदा मत कर,
34तूने मेरा मन मोह लिया है, हे प्राणप्रिय ! कब तेरा दीदार होगा।॥ १॥
35महला ५॥
36ओह दुर्जन ! तू प्रचण्ड अग्नि में जल जा, ओह वियोग ! तू मर ही जा।
37हे पति-प्रभु ! तू मेरी हृदय रूपी सेज पर सो कर सब दुख-दर्द मिटा दे॥ २॥
38महला ५॥
39सच तो यही है कि द्वैतभाव ही दुर्जन है एवं अभिमान का रोग ही वियोग का कारण है।
40सच्चा बादशाह प्रभु ही सज्जन है, जिसे मिलकर आनंद मिलता है॥ ३॥
41पउड़ी।
42हे ईश्वर ! तू अगम्य हैं, दया का सागर है, बेअन्त है, तेरी सही कीमत कौन आँक सकता है।
43तूने समूचे संसार का निर्माण किया है, तू सब लोकों का स्वामी है।
44हे मेरे विश्वव्यापी ठाकुर ! तेरी शक्ति को कोई नहीं जानता।
45तू अनश्वर है, जगत् का उद्धारक है, कोई भी तुझ तक पहुँच नहीं सकता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं