गुरु ग्रंथ साहिब 1093 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1हे ज्ञानवान् पुरुषो ! यदि बूझना है तो इस अकथनीय कथा को मन में ही बुझ लो।
2गुरु के बिना परम तत्व पाया नहीं जा सकता, वह अदृष्ट रूप में सबमें बसा हुआ है।
3यदि सतगुरु मिल जाए तो ही इस रहस्य का ज्ञान होता है और मन में शब्द अवस्थित हो जाता है।
4जब अहम् दूर हो गया तो भ्रम-भय मिट गया और जन्म-मरण का दुख भी विनष्ट हो गया।
5गुरु-मत से ही अदृष्ट प्रभु के दर्शन होते हैं और उत्तम मत से ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है।
6हे नानक ! वह मैं ही हूँ अर्थात् परमात्मा से लीनता वाले मंत्र का जाप करो, तीनों लोकों में वही समाया हुआ है॥ १॥
7महला ३॥
8जिन्होंने शब्द-गुरु का विचार करके मन रूपी माणिक्य को परख लिया है,
9ऐसे व्यक्ति कलियुगी संसार में विरले ही जाने जाते हैं।
10अपने अहम् एवं दुविधा को मारकर वे आत्मस्वरूप में मिले रहते हैं।॥
11हे नानक ! ईश्वर के नाम में लीन रहने वाले ही इस दुस्तर एवं भयानक संसार-सागर से पार हुए हैं।॥ २॥
12पउड़ी॥
13स्वेच्छाचारी अपने अन्तर्मन में तलाश नहीं करते, अपितु अभिमान के कारण ठगे गए हैं।
14वे चारों दिशाओं में घूमकर थक गए हैं और उनके अन्तर्मन में तृष्णाग्नि प्रज्वलित होती रहती है।
15वे स्मृति एवं शास्त्रों का विश्लेषण नहीं करते, अतः स्वेच्छाचारी दुखी हुए हैं।
16गुरु के बिना किसी को परम-सत्य प्रभु नाम नहीं मिला।
17जिन्होंने तत्व-ज्ञान का चिंतन किया है, परमात्मा का जाप करके उनकी गति हो गई है। १६॥
18श्लोक महला २॥
19ईश्वर स्वयं ही जानता है, कर्ता भी स्वयं ही है, स्वयं ही बिगड़े कार्यों को ठीक करता है।
20हे नानक ! उस दीनदयाल के समक्ष ही प्रार्थना करो॥ १॥
21महला १॥
22जिसने दुनिया को उत्पन्न किया है, उसने ही इसकी देखभाल की है, वह सर्वज्ञाता है।
23हे नानक ! जब सब हृदय-घर में ही व्याप्त है, फिर किससे कहा जाए॥ २॥
24पउड़ी॥
25हे जीव ! सब पदार्थों को भुलाकर ईश्वर को अपना मित्र बना,
26इससे मन-तन आनंदित हो जाएगा और प्रभु सब पाप मिटा देगा।
27तेरा आवागमन छूट जाएगा और जन्म-मरण से रहित हो जाओगे।
28सच्चा नाम ही ऐसा सहारा है, जिससे शोक एवं मोह रूपी अग्नि में जलना नहीं पड़ता।
29हे नानक ! परमात्मा का नाम सुखों का भण्डार है, इसे अपने मन में संजोकर रख लो॥२०॥
30श्लोक महला ५॥
31आदमी मन से धन-दौलत को नहीं भूलता, अपितु अधिकाधिक धन की ही लालसा करता है।
32हे नानक ! अगर भाग्य साथ नहीं तो उसे प्रभु भी याद नहीं आता॥ १॥
33महला ५॥
34अरे अन्धे ! माया किसी भी जीव के साथ नहीं चलती, फिर क्यों इससे लिपट रहे हो।
35तू गुरु के चरणों का ध्यान कर, तेरे माया के बन्धन टूट जाएँगे॥ २॥
36पउड़ी॥
37परमात्मा ने अपनी रज़ा में ही अपना हुक्म मनवाया है और ईश्वरेच्छा में ही जीव ने सुख पाया है।
38उसने अपनी इच्छा से जिसे सतिगुरु से मिला दिया है, उसने रज़ा में ही परम-सत्य का मनन किया है।
39सतगुरु ने यह सत्य ही कहकर सुनाया है कि ईश्वरेच्छा जैसी बड़ी अन्य कोई देन नहीं।
40जिनके भाग्य में पूर्व से ही ऐसा लिखा है, उसने ही सत्य का आचरण किया है।
41हे नानक ! उसकी शरण में पड़े रहो, जिसने यह जगत् उत्पन्न किया है॥ २१॥
42श्लोक महला ३॥
43जिनके अंत:करण में ज्ञान नहीं और परमात्मा का थोड़ा-सा भी भय नहीं,
44हे नानक ! भला उन मृतक मनुष्यों को और क्या मारना है, जिन्हें प्रभु ने स्वयं ही मार दिया है॥ १॥
45महला ३॥
46अपने मन की पत्री को पढ़ना ही परम सुख है।
47वही ब्राह्मण भला कहना चाहिए जो ब्रह्म-विचार को बूझ लेता है।
48वह गुरु के शब्द (उपदेश) का गहन चिंतन कर परमात्मा की स्तुति एवं उसके गुणों का अध्ययन करता रहता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं