गुरु ग्रंथ साहिब 108 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1उन्होंने अपना जन्म-जन्मांतरों का पुराना रोग दूर कर लिया है।
2हे मानव ! दिन-रात भगवान का भजन करते रहो, क्योंकि यहीं कार्य फलदायक है॥३॥
3अपनी कृपा-दृष्टि करके प्रभु अपने जिस भक्त को गुणवान बना देता है,
4वह भक्त प्रत्येक हृदय में विद्यमान प्रभु को नमस्कार करता रहता है।
5एक ईश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं है। हे नानक ! यही मति सर्वश्रेष्ठ है॥ ४ ॥ ३९ ॥ ४६ ॥
6माझ महला ५ ॥
7यह मन एवं तन तो प्रिय राम के प्रेम में ही मग्न रहना चाहिए।
8हमें अपना सर्वस्व ही प्रभु को न्यौछावर कर देना चाहिए।
9हमें दिन के आठ प्रहर भगवान की महिमा-स्तुति करनी चाहिए और कोई एक सांस लेते भी उस प्रभु को भूलना नहीं चाहिए॥१॥
10वहीं मेरा प्रिय मित्र एवं सज्जन है,
11जो सत्संग में राम के नाम का चिन्तन करता है।
12संतों की संगति करने से ही भवसागर पार किया जाता है और मृत्यु की फाँसी कट जाती है।॥२॥
13चारों पदार्थ-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रभु की भक्ति से प्राप्त होते हैं।
14अदृष्य एवं भेद रहित परमात्मा की उपासना ही कल्प वृक्ष है।
15सतिगुरु जिस व्यक्ति के अन्तर्मन से काम, क्रोध एवं पाप निवृत कर देते हैं, उसकी प्रभु मिलन की आशा पूरी हो जाती है॥३॥
16जिस प्राणी के पूर्ण भाग्य उदय होते हैं,उसे संतों की संगति करने से सारंगपाणि भगवान मिल जाता है।
17हे नानक ! जिसके हृदय में प्रभु का नाम निवास कर जाता है, वह गृहस्थ जीवन व्यतीत करता हुआ भी माया से उदासीन रहता है और भगवान के दरबार में स्वीकृत हो जाता है।॥४॥४०॥४७॥
18माझ महला ५ ॥
19हरि का नाम-सिमरन करने से मुझे हृदय में सुख प्राप्त हुआ है।
20भगवान के भक्तों ने कृपा करके उसे मेरे मन में प्रगट कर दिया है।
21संतों की सभा में मिलकर मैंने हरि-प्रभु के नाम का ही जाप किया है और मेरा आलस्य रोग मिट गया है॥१I।
22हे भाई ! जिस (भगवान) के गृह में नवनिधियाँ हैं,
23भगवान उस व्यक्ति को ही मिलता है, जिसने पूर्व जन्म में नाम-सिमरन के शुभ कर्म किए हैं।
24पूर्ण परमेश्वर ज्ञान एवं ध्यान से भरपूर है, प्रभु सब कुछ करने में समर्थ है॥२॥
25परमेश्वर क्षण में ही जगत् की उत्पति तथा विनाश करने वाला है।
26ईश्वर स्वयं ही निराकार स्वरूप है और ब्रह्माण्ड रूप सगुण भी स्वयं ही है।
27प्रभु जगत् का जीवन एवं दाता है और माया उसे प्रभावित नहीं करती, वह निर्लिप्त है। उस प्रभु के दर्शन करने से विरह की पीड़ा निवृत हो जाती है।॥३॥
28वह परमात्मा गुरु के आंचल से लगाकर सारी सृष्टि को भवसागर से पार करवाता है।
29भगवान गुरु द्वारा अपने नाम की जीवों से स्वयं ही आराधना करवाता है।
30हे नानक ! जिसकी किस्मत में प्रारब्ध से ही संयोग लिखे होते हैं, उसे भगवान की कृपा से भवसागर पार करने के लिए गुरु रूपी जहाज मिल जाता है॥४॥४१॥४८॥
31माझ महला ५ ॥
32हे भगवान ! मैं वही कुछ करता हूँ जो तुम स्वयं ही मुझ से करवाते हो।
33मेरे लिए वहीं स्थान उत्तम है, जिस स्थान पर तुम रखते हो।
34वहीं व्यक्ति बुद्धिमान और प्रतिष्ठित है जिसको ईश्वर का हुक्म मीठा लगता है॥१॥
35सारी सृष्टि भगवान ने माया रूपी एक धागे में पिरोई हुई है।
36वही व्यक्ति भगवान के चरणों में लगता है, जिसे वह स्वयं अपने चरणों में लगाता है।
37भगवान का निवास मनुष्य के हृदय-कमल में है। यह कमल पहले उलटा पड़ा होता है परन्तु भगवान के सिमरन द्वारा सीधा हो जाता है। फिर इस सीधे हुए कमल में भगवान की ज्योति का प्रकाश हो जाता है। जो व्यक्ति उस प्रकाश को देखता है, वह उस सर्वव्यापक निरंजन के दर्शन करता है॥२॥
38हे भगवान ! अपनी महिमा को तुम स्वयं ही जानते हो
39और तुम अपने स्वरूप को स्वयं ही पहचान सकते हो।
40मैं तेरे संतों पर कुर्बान जाता हूँ, जिन्होंने अपने काम, क्रोध एवं लालच को पीस दिया है॥३॥
41हे ईश्वर ! तुम निर्वेर हो और तेरे सन्त पवित्र हैं,
42जिनके दर्शनों से समस्त पाप दूर हो जाते हैं।
43हे नानक ! मैं प्रभु के नाम की वंदना एवं सिमरन करके ही जीवित हूँ और मेरा कठोर स्वभाव, भ्रम एवं भय नाश हो गए हैं॥४॥४२॥४९॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं