गुरु ग्रंथ साहिब 1088 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1ईश्वर स्वयं ही सब करता-करवाता है और स्वयं सबका रक्षक है॥ ३॥
2श्लोक महला ३॥
3जिन्हें गुरु नहीं मिला, किंचित मात्र भी भय नहीं।
4वे आवागमन का भारी दुख सहन करते हैं और उनकी चिंता कभी दूर नहीं होती।
5जैसे धोते समय मैले कपड़ों को पछाड़ा जाता है और हर वक्त एवं मुहूर्त के बाद घड़ियाल को पीटा जाता है, वैसे ही उनकी पिटाई होती है।
6हे नानक ! सत्य-नाम के बिना सिर से जंजाल दूर नहीं होते॥ १॥
7महला ३॥
8हे मेरे साजन ! तीनों लोकों में ढूंढ कर देख लिया है किं जगत् में अहम् बहुत बुरी बीमारी है।
9नानक का कथन है कि हृदय में परेशानी की अपेक्षा सत्य जपते रहो, सब ओर सत्य ही सत्य है॥ २॥
10पउड़ी॥
11परमात्मा ने गुरुमुखी को स्वयं ही क्षमा कर दिया है और वे हरिनाम में ही लीन रहते हैं।
12उसने स्वयं ही उन्हें भक्ति में लगाया है और शब्द-गुरु द्वारा उन्हें प्रभु -दरबार में जाने के लिए परवाना मिल गया है।
13ईश्वर के उन्मुख रहने वाले सदा सुन्दर लगते हैं और सच्चे द्वार पर प्रसिद्ध हो जाते हैं।
14जिन्होंने राम को पहचान लिया है, वे यहाँ-वहाँ मुक्त हो जाते हैं।
15वे भक्तजन धन्य हैं, जिन्होंने परमात्मा की भक्ति की है और मैं उन पर ही कुर्बान जाता हूँ॥ ४॥
16श्लोक महला १॥
17मुर्ख जीव-स्त्री शरीर रूपी महल में मस्त बनी रहती है, वह मन से काली एवं अपवित्र है।
18हे नानक ! यदि शुभ गुण हों तो ही वह प्रिय-प्रभु से रमण करती है, लेकिन जीव-स्त्री में तो अवगुण ही भरे हुए हैं।॥ १॥
19महला १॥
20वही जीव स्त्री अपने परिवार में पूरी निपुण है, जो सत्यशील, शील स्वभाव एवं संयम वाली है।
21हे नानक ! प्रियतम के प्रेम के कारण वह सदा भली है। ॥२॥
22पउड़ी॥
23जब अपने आप को पहचान लिया तो ही हरि-नाम रूपी सुखों का भण्डार पाया।
24ईश्वर ने अपनी कृपा करके शब्द-गुरु से मिला दिया है।
25गुरु की निर्मल वाणी ने हरि-नाम का पान करवाया है।
26जिन्होंने हरि-रस चखा है, उन्होंने अन्य रसों को त्याग दिया है।
27हरि-रस पीकर वे सदा के लिए तृप्त हो गए हैं और फिर उनकी तृष्णा एवं भूख मिट गई है॥ ५॥
28श्लोक महला ३॥
29जो जीव-स्त्री प्रभु नाम को अपने हृदय का श्रृंगार बनाती है, पति-प्रभु प्रसन्न होकर उससे ही रमण करता है।
30हे नानक ! जो जीव-स्त्री अपने पति की सेवा में तत्पर रहती है, वही शोभावान् नारी है॥ १॥
31महला १॥
32इहलोक एवं परलोक में जीव-स्त्री पति-परमेश्वर की ही सेविका है और उसका पति-परमेश्वर अगम्य एवं अथाह है।
33हे नानक ! वही सुहागेिन धन्य है, जो अपने बेपरवाह प्रभु को भाती है॥ २॥
34पउड़ी॥
35केवल वही राजा तख्त पर विराजमान होता है, जो इसके योग्य होता है।
36सच्चे राजा वही हैं जिन्होंने परम-सत्य को पहचान लिया है।
37वे शासक सही राजे नहीं कहे जाते, जो द्वैतभाव में लीन होकर दुखी होते हैं।
38परमात्मा के पैदा किए जीव की क्या प्रशंसा की जाए, जिसे जगत् से जाते हुए देरी नहीं लगती।
39एक ईश्वर ही सदा अटल है, गुरु के सान्निध्य में जो तथ्य को बूझ लेता है, वह भी अटल हो जाता है॥ ६॥
40श्लोक महला ३॥
41सबका पति-प्रभु एक ही है और कोई भी जीव रूपी स्त्री पति-प्रभु से विहीन नहीं।
42हे नानक ! वास्तव में वही सुहागिन है, जो सतगुरु में लीन रहती है॥ १॥
43महला ३॥
44मन में आशा की अनेक तरंगें उठती रहती हैं, वह प्रभु-द्वार से क्योंकर छूट सकता है।
45यदि वह अपार प्रभु के गहरे प्रेम और सच्चे रंग में लीन हो जाए तो
46हे नानक ! यदि सत्य से चित लग जाए तो गुरु की कृपा से छूट जाता है। २॥
47पउड़ी॥
48परमात्मा का नाम अमूल्य है, इसका मूल्यांकन क्योंकर किया जा सकता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं