सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1083 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1जिसका निवास स्थान सदा अटल है, वह मृत्युलोक, पाताललोक में रहने वाले जीवों के पास ही रहता है॥१२॥

2वह पतितपावन सारे दुःख-भय नाश करने वाला हैं,

3वही अहंकार का निवारण करने वाला है एवं जीवों के जन्म-मरण के चक्र को मिटाने वाला है।

4दीनों पर कृपा करने वाला प्रभु भक्ति से ही प्रसन्न होता है और किसी अन्य गुण से वश नहीं होता।१३॥

5उस निराकार से किसी प्रकार का छल नहीं किया जा सकता, वह सदा अडोल है,

6ज्योतिस्वरूप है और उससे ही समूचा जगत् प्रफुल्लित हुआ है।

7उस सर्वोच्च शक्ति परमेश्वर से वही मिलता है, जिसे वह स्वयं अपने साथ मिलाता है, अपने आप कोई भी उसे पा नहीं सकता।॥ १४॥

8राधा एवं कृष्ण-कन्हैया स्वयं परमात्मा ही हैं और

9गऊओं को वृंदावन में चराने वाला भी वहीं है।

10हे परम पिता ! तू स्वयं ही सृष्टि एवं जीवों को उत्पन्न करता और स्वयं ही नाश भी कर देता है, तुझको तिल मात्र भी संसार से कोई लोभ-मोह नहीं॥ १५॥

11मेरी एक ही जीभ है, यह तेरे कौन-कौन से गुण बयान कर सकती है।

12हजार फनों वाला शेषनाग भी तेरा रहस्य नहीं जानता।

13हे प्रभु ! वह दिन-रात तेरे नए से नए नाम को जपता रहता है किन्तु वह तेरा एक भी गुण वर्णन नहीं कर सकता॥१६॥

14हे जगत् पिता ! मैंने तेरी ओट ली है, तेरी ही शरण में आया हैं।

15भयानक यमदूत नित्य भयभीत करते हैं, यह माया ऐसा सागर है, जिस में से पार होना बहुत कठिन है।

16कृपालु हो जाओ और अपनी इच्छा करके साधु-संतों के ही संग रखो॥ १७॥

17यह दृष्टिमान समूचा जगत्-प्रसार झूठा एवं नश्वर हैं।

18हे गोविन्द ! मैं तुझसे संतजनों की चरणरज़ का ही दान माँगता हैं,

19ताकि मैं इसे अपने माथे पर लगाकर परमपद् (मोक्ष) पा सकें, लेकिन जिसके कर्मालेख में इसकी लधि लिखी है, वहीं इसे प्राप्त करेगा॥१८॥

20जिन पर सुखदाता परमेश्वर ने अपनी कृपा की है,

21उन्होंने साधुओं की चरणरज को लेकर हृदय में बसा लिया है।

22प्रभु-नाम सुखों का भण्डार उन्होंने पा लिया है और उनके मन में अनाहद शब्द गूंज रहा है॥१९॥

23यह जिव्हा तेरे किए कर्मों के आधार पर सुविख्यात नामों का ही कथन कर रही है,

24परन्तु सृष्टि-रचना से पूर्व ही 'सत्य-नाम' तेरा मूल प्राचीन नाम है।

25नानक की प्रार्थना है कि हे सत्यस्वरूप परमेश्वर ! भक्त तो शरण में पड़ गए हैं, उन्हें दर्शन देकर निहाल करो, क्योंकि उनका मन तेरी लगन में हीं लीन है॥ २०॥

26तेरी गति एवं विस्तार तू हीं जानता है,

27तू स्वयं ही कथन करता है और स्वयं ही व्याख्या करता है।

28नानक की विनती है कि हे हरि ! यदि तुझे स्वीकार हो तो मुझे अपने दासों का दास बनाकर उनके ही संग रखो॥२१॥२॥११॥

29मारू महला ५॥

30अल्लाह अगम्य हैं, हे खुदा के बंदे !

31दुनिया के काम-धन्धों का ख्याल छोड़ दो;

32फकीरों के पैरों की धूल बनकर एक मुसाफिर बन जा, ऐसा दरवेश ही खुदा के दर पर कबूल होता है॥१॥

33सत्य को अपनी नमाज एवं खुदा में यकीन को मुसल्ला (दरी) बना।

34अपनी वासनाओं को मारकर आशा को मन से निवृत्त करो।

35अपने शरीर को मस्जिद एवं मन को मौलवी बना लो, पवित्र एवं निर्मल जीवन तेरे लिए खुदा का कलमा पढ़ना है॥२॥

36खुदा का नाम लेकर बंदगी करो,यही नए इस्लामी शरअ अर्थात कानून एवं शरीयत्त शुभ कर्म करना है।

37अभिमान को त्याग कर अपने दिल में ही खुदा को ढूँढो, यह करनी ही तेरे लिए तरीकत हैं।

38हे अब्दल फकीर ! मार्फत यह है कि अपने मन को मारो अर्थात् अपने वश में करो। खुदा से मिलो, यह हकीकत है, जिससे फिर मृत्यु नहीं होती॥३॥

39कुरान, तौरेत, जंबूर इन कर्तबों का पाठ करना यही है कि अपने दिल में खुदा के नाम की कमाई करो।

40अपनी इस औरतों अर्थात् इन्द्रियों को बुराई के राह पर जाने से रोक कर रखों ।

41पाँच मर्दो काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार को धैर्य से पकड़ कर बाँध लो; संतोष एवं दान द्वारा तू अल्लाह को परवान हो जाएगा॥४॥

42जीवों पर मेहर करना ही मक्के का हज करना है और दरवेशों के पैरों की धूल बन जाना रोजा रखना है।

43अपने पीर के वचनों का पूर्णतया पालन करना ही बिहिश्त में जाना है।

44नूर रूप अल्लाह का दर्शन करना ही परियों का सुख भोगना है, खुदा की बंदगी ही शरीर पर सुगन्धि लगाना है, यह दुनिया रूपी खुदा का घर ही बंदगी करने के लिए बेहतर स्थान है॥५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं