गुरु ग्रंथ साहिब 1082 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1उस शूरवीर प्रभु ने स्वयं ही समूचे विश्व में अपना हुक्म चलाया हुआ है,
2उसने स्वयं ही अन्तर्मन में सुख-शान्ति का प्रसार किया हुआ है और वह स्वयं ही बर्फ के सादृश शीतल है।१३॥
3जिसे यह कीर्ति प्रदान करता है, उसे गुरुमुख बना देता है।
4जिसके मन में हरि-नाम स्थित हो जाता है, उसके अन्तर्मन में अनाहतं ध्वनियाँ बजती रहती हैं।
5उसे ही सुख उपलब्ध होता है, उसे ही दुनिया में ऐश्वर्य मिलता है और यम भी उसके निकट नहीं आते॥ १४॥
6कागज़ पर लिखकर भी उसका मूल्य आँका नहीं जा सकता,
7हे नानक ! परमात्मा बेअंत है।
8सृष्टि के आदि, मध्य एवं अन्त तक केवल प्रभु का ही अस्तित्व है और जीवों के किए कर्मों का फैसला उसके ही हाथ में हैं।॥ १५॥
9उसकी बराबरी करने वाला कोई नहीं हैं,
10किसी भी बहाने से उसके हुक्म को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
11नानक का प्रभु अपने आप ही अपनी अद्भुत लीला कर-करके देख रहा है॥ १६॥ १॥ १०॥
12मारू महला ५॥
13अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वर अटल अमर है,
14श्रीकृष्ण के रूप में मधु राक्षस का संहार करने वाला नहीं मधुसुदन, दामोदर सबका स्वामी है।
15यही ह्रषिकेश गोवर्धन पर्वतधारी, मुरली मनोहर श्रीकृष्णावतार है, उस हरि की लीला अपरंपार है। ॥१॥
16उस प्यारे मोहन, माधव, कृष्ण मुरारि,
17जगदीश्वर श्री हरि ने ही असुरों का संहार किया है।
18यह अनश्वर प्रभु समूचे जगत् को जीवन देने वाला हैं, उस ठाकुर जी का घट-घट में वास है॥२॥
19समूची धरती को सहारा देने वाला ईश्वर, नृसिंहावतार में हिरण्यकशिपु का वध करने वाला नारायण ही है।
20अपनी अगली दाढ़ो पर पृथ्वी को उठाकर समुद्र में से निकाल कर लाने वाला वही वाराहावतार है
21हे कर्तार ! तूने ही यामनावतार धारण किया था, तू ही सब का कल्याण करने वाला है॥३॥
22जिसका कोई रूप-रंग एव चिन्ह नहीं है, वहीं श्रीरामचन्द्र अवतार हैं।
23उस बनवारी चक्रपाणि के दर्शन अनुपम है।
24उसके हजारों ही नेत्र हैं हजारों ही मूर्त है, सबको देने चाला एक परमेश्वर ही है और सभी उससे ही माँगते हैं॥४॥
25वह भगतवत्सल, अनाथों का नाथ है,
26सबके संग रहने याला गोपीनाथ भी वहीं कहलाता है,
27उस वासुदेव, मायातीत दाता के गुणों का वर्णन नहीं है सकता॥५॥
28वह मोक्षदाता, मनोहर, श्री लक्ष्मी नारायण समूचे विश्व में पूजनीय है,
29द्रौपदी की लाज रखकर उसका उद्धार करने वाला एक वही हैं।
30वह कमलापति अनेक कौतुक करता रहता हैं। वह आनंद-विनोद करने वाला संसार से सदैव निर्लिप्त रहता है॥६॥
31वह कोई योनि धारण नहीं करता, क्योंकि वह आवागमन के चक्र से रहित है,वह स्वतः प्रकाश स्वयंभू है, उसके दर्शन करने से अवश्य ही शुभ फल मिलता है
32यह काल (मृत्यु) से परे है, अविनाशी होने के कारण उसका अस्तित्व सदैव हैं, जिसका कभी नाश नहीं होता।
33हे परमेश्वर ! अविनाशी, अव्यक्त्त, अदृष्ट सभी विशेषण तुझे ही शोभा देते हैं॥७॥
34वहीं श्रीरंग वैकुण्ठ में वास कर रहा है।
35मत्स्य, कच्छप एवं कूर्म के रूप में विष्णु ने हुक्म से ही अवतार धारण किया था।
36वहीं केशव अद्भुत लीलाएँ करता रहता है, संसार में वही होता है, जो वह चाहता है॥८॥
37वह भोजन-पानी से रहित है, उसका किसी से कोई वैर नहीं, वह सारी दुनिया में समाया हुआ है।
38जग रूपी अद्भुत लीला रचकर ही वह चतुर्भुज कहलाया है।
39उसने ही साँवला सुंदर रूप बनाया था, जिसकी सुरीली बाँसुरी को सुनकर सभी मुग्ध हो गए थे॥९॥
40उस कमलनयन ने वैजयंती माला एवं अनूप आभूषण धारण किए थे।
41उसी ने कानों में सुन्दर कुण्डल, मुकुट धारण किया और वहीं मधुर वचन बोलता है।
42उस ईश्वर ने ही शंख, सुदर्शन चक्र एवं गदा धारण की हुई है और वही (अर्जुन का) महासारथी भी बना॥१०॥
43पीताम्बर धारण करने वाला वहीं तीनों लोकों का स्वामी हैं,
44उसे ही मुख से जगन्नाथ एवं गोपाल कहा जाता है।
45सारंगधर, भगवान विट्ठल इत्यादि उसके अनेकों ही नाम हैं, उसकी महिमा वर्णन नहीं की जा सकती॥11॥
46वह दुख-क्लेश और वासनाओं से रहित कहलाता है।
47वहीं धनंजय समुद्र, पृथ्वी एवं नभ में व्याप्त है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं