गुरु ग्रंथ साहिब 1081 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1यह शरीर रूपी पात्र प्रभु ही बनाने वाला है,
2संतों की संगत करने से नाम-स्मरण की लगन लग गई हैं।
3हरि की वाणी से मेरी अच्छी शोभा बन गई है और मन नाम रूपी मजीठ रंग में रंग गया है॥ १५॥
4सोलह कला सम्पूर्ण परमेश्वर निराकार रूप से पूर्ण साकार रूप बन गया,
5सृष्टि को उत्पन्न करके वह अपने बेअंत रूपों में प्रगट हो गया।
6हे नानक हरि-नाम का सिमरन करने से ही सुख, आनंद एवं खुशियों की लब्धि होती है, अतः हरिनामामृत का ही पान करना चाहिए।१६॥ २॥ ६॥
7मारू सोलहे महला ५
8ੴ सतिगुर प्रसादि॥
9हे ईश्वर ! तू मेरा मालिक हैं और मैं तेरा सेवक हूँ।
10यह आत्मा, शरीर सब तेरा ही दिया हुआ है।
11जग में करने करवाने वाला एक तू ही हैं और हमारा इसमें कोई सहयोग नहीं॥ १॥
12तूने भेजा तो हम जगत् में आए,
13जो तुझे मंजूर हैं, वहीं कर्म करते हैं।
14तेरे हुक्म के बिना कभी कुछ नहीं हुआ, फिर भी हमें कोई चिंता-फिक्र नहीं॥ 2॥
15वहाँ (परलोक में) तेरा हुक्म सुना जाता है और
16यहाँ (इहलोक में) तेरा हरि-यश गाया जाता हैं।
17तु स्वयं ही जीवों के कर्मलेख लिखता है और स्वेच्छा से स्वयं ही कर्मलेख मिटा देता है, अतः तुझसे कोई झगड़ा अथवा शिकायत नहीं॥३॥
18तू हमारा पिता है और हम सभी तेरे बच्चे हैं।
19जैसे तू खेलाता है, वैसे ही खेलते हैं।
20कुमार्ग सब तूने ही बनाया है और कोई भी जीव अपने आप कुमार्ग नहीं चलता॥४॥
21परमात्मा ने किसी को घर में बैठाकर रखा हुआ है,
22कई देश-देशान्तर भेज दिए हैं,
23कोई घास काटने वाला घासी और किसी को उसने राजा बना दिया है, फिर इन में क्या झूठा कहा जा सकता है॥५॥
24कौन मुक्ति प्राप्त करता है, कौन नरक भोगता है ?
25कौन संसार के कर्मों में पड़ा है, कौन भक्त है ?
26कौन चतुर हैं? कौन ओच्छा है? कौन समझदार है? कौन जड़बुद्धि है?॥६॥
27वास्तव में परमात्मा के हुक्म से किसी को मुक्ति मिलती हैं अथवा किसी को नरक भोगना पड़ता है।
28उसके हुक्म से कोई संसार के काम में लीन है और हम से कोई भक्त बनकर भक्ति में लीन है।
29उसके हुक्म से ही कोई ओच्छा और कोई चतुर बनता है। तुम्हारे बिना अन्य कोई गुट नहीं हैं॥७॥
30तूने ही अत्यंत भारी संसार-सागर बनाया है,
31कुछ मनमुखी जीवों को मूर्ख बनाकर उन्हें रसातल में पहुँचा दिया है।
32सतिगुरु जिन जीवों का सच्चा जहाज बन गया है, तूने स्वयं ही उन्हें संसार-सागर से पार करवा दिया है॥८॥
33परमात्मा ने एक लीला रची है कि उसने अपने हुक्म से ही काल को जगत में भेजा है।
34वह जीवों को उत्पन्न करके स्वयं ही मिटा देता है।
35वह स्वयं ही देखता, प्रसन्न होता और सभी रंग-रस भोगता है, यह जगत् रूपी रचना उसने एक अखाड़ा बना रखा हैं॥९॥
36ईश्वर ही सबसे बड़ा है, उसका नाम भी महान् है।
37वह बहुत बड़ा दाता हैं और उसका निवास स्थान भी सर्वश्रेष्ठ है।
38वह जीवों की पहुँच से परे, इन्द्रियातीत, अनंत एवं अतुलनीय है और तोलने के लिए कोई परिमाण नहीं॥१०॥
39अन्य कोई भी उसकी महत्ता को नहीं जानता,
40कालिमा से परे प्रभु स्वयं ही अपनी पूजा करता है।
41वह स्वयं ही ज्ञानवान हैं, स्वयं ही ध्यानशील और स्वयं ही बहुत बड़ा सत्यशील है॥११॥
42कितने ही दिन वह गुप्त बना रहा,
43कितने ही दिन वह शून्य समाधि में समाया रहा,
44उसने कितने ही दिन घोर अन्धेरा बनाकर रखा, वह रचयिता परमेश्वर फिर स्वयं ही जगत् रूप में प्रगट हो गया॥१२॥
45सर्वशक्तिमान परमेश्वर स्वयं ही आदि-शक्ति कहलवाया है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं