सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1079 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1खण्ड, द्वीप एवं सभी लोक उसे याद कर रहे हैं,

2पाताल, पुरियां भी उस परम-सत्य का सुमिरन करने में लीन है,

3उत्पत्ति के चार स्रोत एवं चारों वाणियां उसकी स्मृति में लीन हैं और सभी हरि-भक्त उसे ही स्मरण करते हैं॥२॥

4ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश भी उस ओंकार को ही याद करते हैं,

5तेतीस करोड़ देवते भी उसका स्मरण करते हैं,

6यक्ष, सभी दैत्य भी उस एक का ही सुमिरन करते हैं, असंख्य जीव प्रभु का ही यशगान करते हैं, जिनकी गणना नहीं की जा सकती॥३॥

7पशु-पक्षी, सभी तत्व उसे याद करते हैं,

8वन, पर्वत एवं अवधूत भी उसका सिमरन करते हैं,

9लता, पेड़, शाखा इत्यादि सभी उसकी आराधना करते हैं, सभी जीवों के मन में परमेश्वर ही रमण कर रहा है | ४॥

10सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर वाले सभी जीव उसका स्मरण करते हैं,

11बड़े-बड़े सिद्ध-साधक हरि-नाम मंत्र का ध्यान करते रहते हैं।

12सभी गुप्त एवं प्रगट जीव मेरे प्रभु को ही याद पाते हैं, मेरा प्रभु तो आकाश, पाताल, पृवी इत्यादि सभी लोकों का स्वामी है॥५॥

13ब्रम्हचार्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास-इन चार आश्रमों के नर -नारी भी परमात्मा की ही अर्चना करते हैं,

14सभी जातियाँ-क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य एवं शूद्र इन चारों वर्गों के लोग,

15सूक्ष्म शरीर वाली आत्मा सब उसकी ही वंदना करते हैं। सभी गुणवान्, चतुर एवं विद्वान दिन-रात ईश्वर की ही उपासना करते हैं॥६॥

16घड़ी, मुहूर्त, पल एवं निमेष उसे ही याद करते रहते हैं,

17काल, काल से रहित, संयम एवं शारीरिक पवित्रता रखने वाले प्राणी भगवान की स्मृति में लीन रहते हैं;

18शगुन, शास्त्र एवं संयोग बताने वाले ज्योतिषी भी उसका सिमरन करते हैं लेकिन उस अलख परमेश्वर के एक क्षण दर्शन नहीं किए जा सकते॥७॥

19हे मालिक! तू सब कुछ करने-करवाने में समर्थ है,

20सबके दिल की भावना को जानने वाला है।

21तूने कृपा करके जिसे भक्ति में लगाया है, उसने अपना जन्म जीत लिया है॥ ८॥

22जिसके मन में प्रभु की स्मृति बस गई है,

23पूर्ण भाग्य से वह गुरु का जाप जता रहता है और

24उसने प्रभु को सर्वव्यापी मान लिया है, अतः वह पुनः योनि-चक्र के दुख में नहीं भटकता॥९॥

25जिस के मन में गुरु का शब्द वास कर जाता है, उसका दुख-दर्द एवं भ्रम दूर हो जाता है।

26यह नामामृत का पान करके सहज-सुख एवं आनंद में रहता है और मन में रसीली ध्वनि वाली अनाहत वाणी सुनता रहता है।॥१०॥

27वही धनवान है, जिसने प्रभु का ध्यान किया है

28वही प्रतिष्ठित है, जिसने साधसंगत पा ली है।

29जिस मनुष्य के मन में परब्रह्म बस गया है, वह पूर्ण खुश किस्मत है और वह जग में छिपा नहीं रहता॥११॥

30सागर, भूमि एवं आकाश में प्रभु ही है,

31उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कहा जा सकता।

32गुरु के ज्ञान रूपी सुरमे ने मेरा सारा भ्रम मिटा दिया है और अब एक परमेश्वर के सिवाय अन्य कोई दृष्टिगत नहीं होता॥ १२॥

33ईश्वर का दरबार सबसे ऊँचा है,

34उसका कोई अन्त एवं आर-पार व्यक्त नहीं किया जा सकता।

35वह सबका स्वामी गहन-गम्भीर, अथाह एवं अतुलनीय है, उसकी महिमा को क्या तौला जा सकता है॥१३॥

36तू रचयिता है और यह समूचा संसार तेरा ही बनाया हुआ है,

37तेरे अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं।

38हे प्रभु ! जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एक तू ही हैं और यह समूचा जगत्-प्रसार तेरा शरीर है॥१४॥

39यमदूत उस व्यक्ति के निकट भी नहीं आता।

40जो व्यक्ति साधसंगत में ईश्वर का कीर्ति-गान करता है,

41जो अपने कानों से प्रभु का यश सुनता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं॥१५॥

42तू सबका रखवाला है और सबको तेरा ही सहारा हैं। हे सच्चे मालिक ! तू गहन-गंभीर है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं