सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1077 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1कई भूखे रहते हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खा कर तृप्त रहते हैं, मगर सब जीवों को एक तेरा ही भरोसा है॥ ३॥

2वह सत्यस्वरूप परमेश्वर स्वयं ही सत्य है,

3वह ताने-बाने की तरह भक्तों के संग लीन रहता है।

4वह स्वयं ही गुप्त निवास करता है और भक्तों को दर्शन देने के लिए स्वयं ही प्रत्यक्ष हो जाता है, यह सारी दुनिया उसका ही प्रसार है॥ ४॥

5अनन्तकाल सदा सर्वदा ईश्वर ही रहने वाला है,

6वह सबसे ऊँचा, अगम्य, अथाह एवं अपरंपार है।

7मेरे स्वामी के यह अद्भुत कौतुक हैं कि वह खाली बर्तन को भी भर देता है और भरे हुए को खाली कर देता है॥ ५॥

8हे सच्चे मालिक ! मैं मुँह से तेरी ही स्तुति करता हूँ,

9नयनों से अगम्य-अथाह प्रभु को ही देखता हूँ।

10अपने कानों से तेरा यश सुन-सुनकर मेरा मन-तन आनंदित हो गया है, हे मालिक ! तू सबका उद्धारक है। ६॥

11वह अपनी सृष्टि-रचना को देखता रहता है और

12सभी जीव परमेश्वर का ही नाम जप रहे हैं।

13अपनी कुदरत को वह स्वयं ही जानता है और कृपा-दृष्टि करके जीवों को निहाल कर देता है॥ ७॥

14जहाँ संतों की सभा में भक्तजन बैठते हैं, वहाँ प्रभु उनके पास ही विराजमान होता है।

15वहाँ पर परमात्मा की अद्भुत लीला-तमाशों का कथन एवं मंगलगान होता है।

16जब वहाँ वाणी द्वारा भगवान का गुणगान होता है तो अनाहत ध्वनि गूंजती रहती है, दास नानक भी परमात्मा के स्मरण में ही लीन है॥ ८॥

17हे परमेश्वर ! जन्म-मरण सब तेरी एक लीला है,

18तू अपनी यह अद्भुत खेल कर-करके देख रहा है।

19हे उत्पन्न करने वाले ! तू ही उत्पन्न करता है और अपनी पैदा की हुई दुनिया का तू स्वयं ही पोषण करता है॥९॥

20मैं तेरी महिमा सुन-सुनकर जीवन पा रहा हूँ और

21सदा तुझ पर बलिहारी जाता हूँ।

22हे मेरे स्वामी ! मैं दोनों हाथ जोड़कर दिन-रात तेरी वंदना करता हूँ॥ १०॥

23तुझ बिन किसी अन्य की मैं क्या प्रशंसा करूं ?

24मैं तो मन में केपल तेरा ही नाम जपता रहता हूँ।

25तेरे हुक्म के रहस्य को बूझ कर भक्तजन निहाल हो गए हैं और तेरे भक्तों की यही साधना है॥ ११॥

26गुरु के उपदेश से मन में परमात्मा को ही जपना चाहिए,

27गुरु के उपदेश द्वारा राम के प्रेम रंग में लीन रहना चाहिए।

28गुरु के उपदेश से सभी बन्धन टूट जाते हैं और माया का यह मोह-भ्रम भी जल जाता है।॥ १२॥

29जहाँ भी ईश्वर रखता है, वही सुख का स्थान है,

30जो कुछ भी सहज स्वभाव होता है, उसे ही भला मानना चाहिए।

31यद्यपि मन में से वैर भावना नाश हो जाए तो कोई वैरी नहीं रहता और सब में एक परमात्मा को ही खोजना चाहिए। १३॥

32मेरे सभी डर समाप्त हो गए हैं और अज्ञानता रूपी अंधेरा मिट गया है।

33परम पुरुष एवं निराला प्रभु हृदय में प्रगट हो गया है।

34मैं अपने अहम् को छोड़कर उसकी शरण में पड़ गया हूँ और जिसका बनाया हुआ हूँ, उसकी ही उपासना की है॥ १४॥

35दुनिया में ऐसा कोई खुशनसीब ही आया है,

36जिसने आठ प्रहर मालिक का चिंतन किया है।

37उस महापुरुष की संगत करके हर कोई संसार-सागर से पार हो जाता है और वह अपने परिवार का भी कल्याण करवा देता है॥ १५॥

38मैं अपने मालिक से यही वरदान चाहता हूँ कि

39हाथ जोड़कर आठ प्रहर उसकी ही अर्चना करता रहूँ।

40नानक विनती करता है कि हे परमेश्वर ! यदि मुझे तेरा नाम मिल जाए तो उसका ही उच्चारण करता रहूँ और नाम जप कर सहजावस्था द्वारा नाम में समाहित हो जाऊँ॥ १६॥ १॥ ६॥

41मारू महला ५॥

42हे नादान मानव ! सुन्दर रूप देखकर किसी भूल में मत पड़,

43क्योंकि माया का मोह प्रसार सब झूठा और नाशवान है।

44मृत्यु अटल है, अतः जगत् में कोई सदा के लिए रहने वाला नहीं, केवल एक ईश्वर ही अटल-अमर है॥ १॥

45पूर्ण गुरु की शरण में पड़ो,

46क्योंकि वह तुम्हारा मोह, शोक एवं समूचा भ्रम मिटाने वाला है।

47वह औषधि के रूप में केवल नाम-मंत्र ही दृढ़ करवाता है और गुरु का यही उपदेश है कि हृदय में सत्य-नाम का ही गुणगान करते रहो॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं