गुरु ग्रंथ साहिब 1073 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1स्त्री ज्ञानहीन है किन्तु पति चतुर एवं बुद्धिमान है।
2परमात्मा ने यह रचना पाँच तत्वों से बनाई है,
3जिस नाम रूपी वस्तु के लिए तुम जगत् में आए हो, वह वस्तु सतिगुरु से प्राप्त होती है॥ ६॥
4स्त्री कहती है कि हे मेरे स्वामी ! तुम सदा ही मेरे संग रहो,
5तुम्हारे संग सुख में रहना मेरा कुटम्ब है।
6तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है, मुझे वचन दो कि तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगे॥ ७॥
7(आत्मा रूपी) पति (शरीर रूपी) पत्नी को सच्ची बात कहता है कि मैं तो परमात्मा के हुक्म का पालन करने वाला बंदा हूँ,
8वह समूचे जगत् का मालिक है, जिसे किसी बात की कोई परवाह एवं भय नहीं।
9जब तक प्रभु मुझे रखेगा, तब तक ही मैंने तेरे साथ रहना है, जब वह मुझे बुलाएगा मैंने यहाँ से चले जाना है॥ ८॥
10जब पति ने अपनी पत्नी को ऐसे सच्चे वचन कहे तो
11तुच्छ मति वाली चंचल स्त्री ने कुछ भी न समझा।
12वह बार-बार प्रेिय का संग ही माँगती अपने पति की बात को व्यंग्य ही समझ लिया॥ ९॥
13जब प्रभु की आज्ञा आई तो पति चल लिया,
14पति ने न ही अपनी पत्नी से पूछा और न ही उसके साथ कोई सलाह की।
15पति उठकर चला गया और विधवा पत्नी मिट्टी हो गई।
16हे नानक ! इस सच्चाई को देख लो,माया का प्रसार मिथ्या ही है॥ १०॥
17हे लोभी मन! जरा ध्यानपूर्वक सुन;
18दिन-रात सदैव सतिगुरु की सेवा करो,
19सतिगुरु के बिना पदार्थवादी जीव गल सड़कर मर गए हैं और उन निगुरों के गले में यम का फंदा ही पड़ता है॥ ११॥
20मनमुखी जीव जन्मते-मरते रहते हैं और उनको बार-बार यम से चोटें प्राप्त होती हैं।
21जितने भी नरक हैं, मनमुखी उतने ही भोगते हैं, लेकिन गुरुमुख को तिल मात्र भी दुख प्रभावित नहीं करता॥ १२॥
22वास्तव में गुरुमुख वही है, जो भगवान् को भाया है।
23जिसे प्रभु ने यश प्रदान किया है, उसकी शोभा कौन मिटा सकता है।
24जिसके गले में परमात्मा ने सम्मान का सिरोपा पहनाया है, वह सदा परमानंद में लीन रहता है।॥ १३॥
25मैं पूर्ण सतगुरु पर बलिहारी जाता हूँ।
26हे शरण दाता, वचन के शूरवीर सतगुरु !
27तेरी दया से मुझे सुख देने वाला ऐसा प्रभु मिला है, जिससे बिछुड़ कर में कहीं नहीं जाता॥ १४॥
28उस गुणनिधान परमेश्वर की महिमा की कीमत नहीं ऑकी जा सकती,
29वह घट-घट सबमें रमण कर रहा है।
30नानक तो दोनों के दुख नाश करने वाले परमात्मा की शरण में है और प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! मैं तेरे दासों की चरण-धूलि बना रहूं।।१५॥ १॥ २॥
31मारू सोलहे महला ५
32ੴ सतिगुर प्रसादि॥
33मेरा आनंदी प्रभु सदा आनंद करता है,
34वह घट-घट में व्याप्त है और प्रत्येक जीव का कमों के अनुसार ही निपटारा करता है।
35वह सत्यस्वरूप परमेश्वर बादशाहों से भी बड़ा बादशाह है और उसके अलावा अन्य कोई बड़ा नहीं॥ १॥
36खुशदिल, बेअंत एवं दयालु
37प्रभु की ज्योति का प्रकाश सब में प्रगट है।
38वह अपने अनेक रूप पैदा करके उन्हें देखकर प्रसन्न होता है और स्वयं ही पुजारी के रूप में अपनी पूजा करता है॥ २॥
39वह स्वयं ही विचार करके कुदरत को रचता है और
40स्वयं ही जगत्-प्रसार करता है।
41वह स्वयं ही जीवों को दिन-रात खेल खेलाता रहता है और स्वयं ही अपना यश सुनकर प्रसन्न होता है।॥३॥
42उसका सिंहासन सदा अटल है और उसकी बादशाहत भी सच्ची है।
43उसका खजाना सत्य है और वही सच्चा शाह है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं