सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1072 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1जो सर्वव्यापी एवं अन्तर्यामी है।

2उस पूर्ण परमेश्वर का सिमरन करके सारी चिन्ता मिटा ली है॥ ८॥

3परमात्मा के नाम में लाखों-करोड़ों बाजुओं का बाहुबल है और

4हरि का कीर्तिगान ही सबसे बड़ा धन है।

5प्रभु ने कृपा करके ज्ञान रूपी खडग दी है, जिससे पाँच दूतों काम-क्रोध को मार कर भगा दिया है॥ ६॥

6परमात्मा के नाम का जाप करो, क्योंकि यही जपने योग्य है।

7अपनी जीवनबाजी को जीतकर अपने सच्चे घर में आकर बस जाओ।

8प्रेमपूर्वक मजे लेकर भगवान् का गुणगान करो, इस प्रकार चौरासी लाख योनियों का नरक मत देखो अर्थात् इसमें मत पड़ो॥ १०॥

9परमात्मा खण्ड-ब्रह्मांड के जीवों का उद्धार करने वाला है,

10वह सब देवी-देवताओं से भी ऊँचा, ज्ञान का अथाह सागर, जीवों की पहुँच से परे एवं अपार है।

11प्रभु जिस पर अपनी कृपा करता है, वही जीव उसका मनन करता है॥ ११॥

12प्रभु ने सब बन्धन तोड़कर मुझे मोल ले लिया है और

13कृपा करके अपने घर का सेवक बना लिया है।

14अब मैंने नामस्मरण का सच्चा कार्य कर लिया है, अतः मन में अनाहत शब्द की आनंदमय ध्वनि की मंद-मंद मीठी झंकार होती रहती है।॥ १२॥

15हे प्रभु ! मेरे मन में तेरे प्रति आस्था बन गयी है,

16जिससे मेरी अहम् मत (बुद्धि ) नाश हो गई है।

17मेरे प्रभु ने मेरा पक्ष किया है और समूचे जगत् में मेरी सुन्दर शोभा हो गई है॥ १३॥

18उस जगदीश्वर की जय-जयकार करते हुए उसका ही नाम जपो,

19मैं तो अपने ईश्वर पर बलिहारी जाता हूँ।

20समूचे जगत् में एक वही मौजूद है और उसके बिना अन्य कोई दृष्टिमान नहीं होता॥ १४॥

21मैंने जान लिया है कि एक प्रभु ही परम सत्य है,

22गुरु की कृपा से मेरा मन सदा उसमें ही लीन रहता है।

23हे परमेश्वर ! तेरे भक्तजन तेरा नाम-स्मरण करते हुए ही जी रहे हैं और वे तो ओमकार की स्मृति में ही लीन रहते हैं।॥ १५॥

24प्रभु भक्तजनों का प्रियतम प्यारा है,

25हमारा मालिक सबका उद्धार करने वाला है।

26हे नानक ! परमात्मा का नाम-स्मरण करने से हमारी सब मनोकामनाएँ पूरी हो गई हैं और उसने हमारी लाज रख ली है॥ १६॥ १॥

27मारू सोलहे महला ५

28ੴ सतिगुर प्रसादि॥

29(शरीर रूपी) नारी अपने संगी (आत्मा रूपी) योगी से लिपटी रहती है,

30वह उसी में उलझकर रंगरलियां एवं आनंद लेती है।

31कर्मो के संयोग से ये इकठ्ठे हो गए हैं और भोग-विलास करते रहते हैं।॥ १॥

32उसका पति जो कुछ भी करता है, स्त्री उसे तत्क्षण मान लेती है।

33पति अपनी पत्नी को श्रृंगार कर अपने संग रखता है।

34वे दोनों मिलकर दिन-रात इकठ्ठे ही रहते हैं और पति अपनी पत्नी को दिलासा देता रहता है।॥ २॥

35जब पत्नी पति से कुछ माँगती है तो वह अनेक प्रकार से इधर-उधर भागदौड़ करता है।

36जो कुछ वह प्राप्त करता है, उसे लाकर वह अपनी स्त्री को दिखाता है।

37परन्तु (आत्मा रूपी) पति एक हरि-नाम रूपी वस्तु तक पहुँच नहीं सकता और इस वस्तु के बिना उसकी (शरीर रूपी) स्त्री को माया की भूख-प्यास लगी रहती है।॥ ३॥

38स्त्री अपने दोनों हाथ जोड़कर विनती करती है कि

39हे मेरे प्रियवर ! मुझे छोड़कर परदेस मत जाओ और मेरे घर में ही बसते रहो।

40घर में रहकर ऐसा वाणिज्य-व्यापार करो, जिसरो मेरी तमाम भूख-प्यास मिट जाए॥ ४॥

41(आत्मा रूपी) पति एवं (शरीर रूपी) पत्नी ने सभी युग के धर्म-कर्म करके देख लिए हैं,

42परन्तु हरि-नाम रस के बिना इन्हें तिल मात्र भी सुख नहीं मिला।

43हे नानक ! जब सत्संग द्वारा प्रभु की कृपा हो गई तो पत्नी एवं पति आनंद-उल्लास में मग्न हो गए॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं