गुरु ग्रंथ साहिब 1071 · Raag Maaroo · Guru Raam Daas Ji
1अहम्-भावना में की हुई सेवा साकार नहीं होती,
2इस तरह का जीव जीवन-मृत्यु के चक्र में ही फंसा रहता है।
3वही तपस्या एवं सेवा पूर्ण है, जो मेरे परमेश्वर के मन को भा गई है।॥ ११॥
4हे स्वामी ! मैं तेरे गुणों का क्या वर्णन करूं,
5तू तो सब जीवों के मन की भावना को जानता है।
6हे रचयिता ! मैं तुझसे केवल यही दान माँगता हूँ कि मैं प्रतिदिन तेरे नाम का स्तुतिगान करता रहूँ॥ १२॥
7किसी मनुष्य में अधिक बोलने का अहंकार तथा ताकत का घमण्ड है।
8किसी के पास दरबार एवं धन-सम्पति का बल है।
9लेकिन मुझे तो भगवान् के सिवा अन्य कोई सहारा नहीं है। हे स्रष्टा ! मैं विनीत हूँ तू मुझे बचा ले॥ १३॥
10जब तुझे अच्छा लगता है तो ही तू सम्मानहीन को सम्मान प्रदान करता है,
11अन्य कितनी ही दुनिया दुखी होकर आवागमन में पड़ी रहती है।
12हे स्वामी ! तू जिनका भी पक्ष करता है, तूने उनकी बात सर्वोपरि कर दी है॥ १४॥
13जिन्होंने सदैव ही परमात्मा के नाम का चिंतन किया है,
14गुरु की कृपा से उन्होंने ही मोक्ष पाया है।
15जिसने भी प्रभु की आराधना की है, उसे ही सुख उपलब्ध हुआ। उसकी सेवा के बिना कितनी ही दुनिया पछता रही है॥ १५॥
16हे संसार के मालिक ! तू सब जीवों में कार्यशील है।
17प्रभु को वही जपता है, जिसके माथे पर गुरु का आशीर्वाद होता है।
18प्रभु की शरण में से ही जाप होता है और नानक तो उसके दासों का भी दास है।॥ १६॥ २॥
19मारू सोलहे महला ५
20ੴ सतिगुर प्रसादि॥
21हे भाई ! जिसने शक्ति को उत्पन्न करके पृथ्वी को धारण किया हुआ है,
22गगन को अपने हुक्म रूपी चरणों में टिकाया हुआ है,
23अग्नि को उत्पन्न करके ईंधन में बाँध दिया है, सो वह प्रभु ही सबकी रक्षा करता है॥ १॥
24जो सब जीवों को आहार पहुँचाता है,
25वह स्वयं ही सब कुछ करने-कराने में समर्थ है।
26जो पल में बनाने एवं मिटाने वाला है, वह प्रभु ही तेरा सहायक है॥ २॥
27जिसने माँ के गर्भ में तेरा पोषण किया,
28प्रत्येक श्वास एवं ग्रास के साथ तेरा संगी बनकर हिफाजत की है,
29सर्वदा उस प्रियतम का ही नाम जपना चाहिए, जिसकी बड़ाई सबसे बड़ी है॥ ३॥
30यदि उसकी मर्जी हो तो वह एक क्षण में बड़े-बड़े सुलतानों एवं खानों को छोटा-सा कीड़ा अर्थात् भिखारी बना देता है।
31प्रभु अपनी कृपा करके गरीब को भी बादशाह बना देता है।
32अभिमान का निवारण करने वाला परमात्मा सर्व-साधारण का सहारा है, जिसकी महिमा का मूल्य कुछ भी नहीं किया जा सकता॥ ४॥
33वही इज्जतदार और वही धनवान् है,
34जिसके मन में भगवान की स्मृति बस गई है।
35जिसने यह सृष्टि उत्पन्न की है, वह परम-परमेश्वर ही हमारा माता-पिता, पुत्र, भाई एवं रिश्तेदार है॥ ५॥
36प्रभु की शरण में आने से कोई भय प्रभावित नहीं करता।
37साधु-संगति में निश्चित ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है।
38जो मन, वचन एवं कर्म द्वारा भगवान् की आराधना करता है, उसे कभी कोई दण्ड नहीं मिलता।॥ ६॥
39जिसके मन एवं तन में गुणों के भण्डार परमेश्वर की स्मृति बस गई है,
40वह जन्म-मरण की योनियों में नहीं भटकता।
41जब मन तृप्त होकर हर्षित रहता है तो सब दुख नाश हो जाते हैं और सर्व सुख मन में निवास कर लेते हैं।॥ ७॥
42वह स्वामी ही हमारा मित्र है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं