गुरु ग्रंथ साहिब 1070 · Raag Maaroo · Guru Raam Daas Ji
1गुरुमुख नाम में लीन रहकर परमात्मा में ही विलीन हो जाता है, हे नानक ! वह परमात्मा के नाम का ही मनन करता रहता है।॥ १२॥
2भक्तों के मुँह में हर वक्त अमृत-वाणी ही रहती है,
3गुरु ने अपने मुखारबिंद से हरि-नाम ही कहकर सुनाया है।
4परमात्मा का नाम जपने से मन सदा खिला रहता है, अतः परमात्मा के चरणों में ही मन लगाया है॥ १३॥
5हम मूर्ख एवं अज्ञानी हैं और हमें कुछ भी ज्ञान नहीं है।
6अब मन में सतगुरु से समझ पड़ गई है।
7हे प्रभु जी ! दयालु हो जाओ और कृपा करके सतगुरु की सेवा में लगाकर रखो॥ १४॥
8जिसने सतगुरु को जान लिया है, उसने एक परमेश्वर को भी पहचान लिया है।
9जीवों को सुख देने वाला परमेश्वर सर्वव्यापक है।
10जिस जीव ने अपनी आत्म-ज्योति को पहचान कर परम पद पाया है, उसकी सुरति प्रभु-सेवा में ही लीन रहती है॥ १५॥
11जिन्हें प्रारम्भ से ही बड़ाई मिली है,
12सतगुरु उनके मन में बसा रहता है और उनकी उसमें ही लगन लगी रहती है।
13हे नानक ! संसार को जीवन देने वाला निरंकार प्रभु स्वयं ही उन्हें मिला है और वे उसके चरणों में ही लीन रहते हैं॥ १६॥ १॥
14मारू महला ४॥
15मन-वाणी से परे परमेश्वर सदा अनश्वर है,
16सर्वव्याप्त सब में रमण कर रहा है।
17उसके अतिरिक्त अन्य कोई देने वाला नहीं है, हे प्राणियो ! सो ऐसे प्रभु की उपासना करते रहो॥ १॥
18ईश्वर समूचे संसार का रखवाला है,अतः जिसकी भी वह रक्षा करता है, उसे कोई भी मार नहीं सकता।
19हे भक्तजनो ! सो ऐसे ईश्वर की अर्चना करो, जिसकी वाणी सबसे उत्तम है।॥ २॥
20जहाँ मालूम होता है कि किसी स्थान पर कुछ भी नहीं है,
21वहाँ ईश्वर सर्वव्यापी है।
22जिसने सूखे को भी पुनः हरा-भरा कर दिया है, जिसकी लीला बड़ी अद्भुत है, सो उस परमेश्वर का भजन करो॥ ३॥
23जो सब जीवों का दुख-दर्द जानता है।
24मैं तो उस मालिक पर ही कुर्बान जाता हूँ,
25हे भक्तजनो ! उसके समक्ष ही विनती करो जो सर्व सुखों का दाता है।॥४॥
26जो दिल की खबर नहीं जानता,
27उस नासमझ इन्सान को कुछ भी नहीं कहना चाहिए।
28हे प्राणी ! मूर्ख आदमी से कभी झगड़ा मत करो, अपितु भगवान का जाप करते रहना चाहिए, जिससे निर्वाण पद मिलता है।॥५॥
29हे मानव ! किसी बात की चिंता मत करो, कयोंकि परमात्मा को तो सबकी चिंता है।
30वह तो समुद्र-पृथ्वी में रहने वाले सब जीवों को आहार देता है।
31मेरा प्रभु तो पत्थर की चट्टानों में रहने वाले कीटों को भी रिजक देता है॥ ६॥
32अपने मित्र, पुत्र एवं भाई की भी कोई आशा मत करो और
33न ही किसी साहूकार एवं अपने वाणिज्य-व्यापार की कोई पराई आशा करो।
34परमात्मा के नाम बिना कोई भी तेरा सच्चा साथी नहीं, सो उसका नाम जपते रहना चाहिए॥ ७॥
35प्रतिदिन परमात्मा का नाम जपते रहो;
36वह तेरी सब आशाएँ एवं मनोरथ पूरे कर देगा।
37हे नानक ! जन्म-मरण का चक्र मिटाने वाले प्रभु का नाम जपते रहो; इससे तेरी जीवन रूपी रात्रि सुखमय एवं परमानंद में व्यतीत होगी।॥ ८॥
38जिसने भी ईश्वर की उपासना की है, उसने ही सुख पाया है और
39वह सहजावस्था में प्रभु-नाम में विलीन हो गया है।
40जो भी उसकी शरण में पड़े हैं, प्रभु ने उनकी लाज रखी है, इस सच्चाई के संदर्भ में वेद-पुराण भी हामी भरते हैं।॥ ९॥
41भगवान जिसे अपनी आराधना में लगाता है, वही खुशनसीब उसकी आराधना में तल्लीन होता है।
42गुरु के उपदेश द्वारा भ्रम एवं भय दूर हो जाता है।
43जैसे पानी में कमल का फूल निर्लिप्त रहता है, वैसे ही ऐसा मनुष्य गृहस्थ में भी माया से सदा विरक्त रहता है॥ १०॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं