सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 106 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji

1परमेश्वर समस्त प्राणियों को देने वाला है।

2गुरु की कृपा से उसने हमें दया की नज़र से देख लिया है।

3सागर, धरती एवं गगन में रहने वाले समस्त प्राणी तृप्त हो गए हैं। मैं संत-गुरु के चरण धोता हूँ॥३॥

4परमात्मा मन की इच्छा पूरी करने वाला है।

5मैं सदैव ही उस पर कुर्बान जाता हूँ।

6हे नानक ! दुख नाशक प्रभु ने मुझे यह दान दिया है कि मैं उसकी प्रीति में मग्न हो गया हूँ जो प्रसन्नता का घर है॥४॥३२॥३९॥

7माझ महला ५ ॥

8हे भगवान ! मेरा मन एवं तन तेरा ही दिया हुआ है और धन भी तेरा ही दिया हुआ है।

9हे ईश्वर ! तुम मेरे ठाकुर एवं स्वामी हो।

10हे प्रभु ! मेरे प्राण एवं तन तेरी ही पूंजी है। हे गोपाल ! मेरी प्रभुता तुझ से ही है॥१॥

11हे परमेश्वर ! सर्वदा तुम सुख प्रदान करने वाले हो।

12मैं नतमस्तक होकर तुझे ही नमन करता हूँ और तेरे चरण स्पर्श करता हूँ।

13हे दयालु परमात्मा ! मैं वहीं कार्य करूँगा जो तू मुझे करने के लिए देगा और जो तुझे अच्छा लगे॥ २॥

14हे भगवान ! मैं सबकुछ तुझ से ही लेता हूँ और तुम ही मेरे आभूषण हो।

15हे अकालपुरुष ! जो कुछ तुम मुझे दुःख-सुख देते हो, मैं उसको सुख समझकर सहता हूँ।

16हे भगवान ! जहाँ कहीं भी तुम मुझे रखते हो, वही मेरा स्वर्ग है। तुम सबकी रक्षा करने वाले हो॥३॥

17हे नानक ! उस परम पिता परमेश्वर की आराधना करने से मुझे सुख उपलब्ध हो गया है।

18हे प्रभु ! दिन के आठों प्रहर तेरी महिमा गायन करता हूँ।

19उसके हृदय के समस्त मनोरथ पूर्ण हो गए हैं और अब वह कभी भी दुखी नहीं होता ॥४॥३३॥४०॥

20माझ महला ५ ॥

21पारब्रह्म प्रभु ने मेघ को वर्षा करने के लिए भेजा है।

22मेघ ने सागर, धरती एवं आकाश दसों दिशाओं में वर्षा की है।

23वर्षा से जीवों के अन्र्तमन में सुख-शांति हो गई है तथा उनकी सारी प्यास मिट गई है और समस्त स्थानों पर प्रसन्नता हो गई है॥१॥

24हे भगवान ! तू सुख प्रदान करने वाला और दुःख नाश करने वाला है।

25तू स्वयं ही समस्त प्राणियों को क्षमा करता है।

26अपनी सृष्टि का वह स्वयं ही पालन पोषण करता है। मैं उसके चरणों में नतमस्तक होकर उसे प्रसन्न करता हूँ॥२॥

27जिस भगवान की शरण लेने से मुक्ति प्राप्त होती है,

28श्वास-श्वास से उस भगवान के नाम का ही ध्यान करना चाहिए।

29उसके अलावा अन्य कोई दूसरा स्वामी नहीं। समस्त स्थान केवल उसी के हैं॥३॥

30हे प्रभु ! मुझे तेरा ही मान एवं तेरा ही बल है।

31तू ही मेरा सच्चा स्वामी एवं गुणों का सागर है।

32दास नानक एक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! दिन के आठों प्रहर मैं तेरा ही ध्यान करता रहूँ॥४॥३४॥ ४१॥

33माझ महला ५ ॥

34जब प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं तो समस्त सुख उपलब्ध हो जाते हैं।

35फिर पूर्ण गुरु के चरण मन में निवास कर लेते हैं।

36जिसकी प्रभु की सुरति में सहज समाधि लग जाती है, वही व्यक्ति इस आनंद को जानता है ॥ १ ॥

37मेरा परमेश्वर अगम्य एवं अगोचर है ।

38वह प्रत्येक ह्रदय मे निकट ही रहता है ।

39वह सदैव निर्लेप है और जीवों का दाता है। कोई विरला पुरुष ही अपने स्वरूप को समझता है॥२॥

40प्रभु के मिलन का यही लक्षण है कि

41मनुष्य अपने मन में एक सत्यस्वरूप परमात्मा के हुक्म की ही पहचान करता है ।

42प्रभु की इच्छा अनुसार चलने वाले मनुष्य को सदैव सुख, संतोष, तृप्ति एवं हर्ष प्राप्त होता है ॥३॥

43दाता परमेश्वर ने मुझे अपना हाथ दिया है अर्थात् सहारा दिया है और

44प्रभु ने जीवन-मृत्यु के समूह कष्ट दूर कर दिए हैं।

45हे नानक ! जिनको परमात्मा ने अपना सेवक बना लिया है, वह प्रभु का यशोगान करने का आनंद प्राप्त करते हैं॥ ४ ॥ ३५ ॥ ४२ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं