सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1068 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1परन्तु जो शब्द-गुरु के अनुरूप आचरण अपनाता है, उसकी तृष्णाग्नि बुझ जाती है।

2उसका तन-मन शीतल हो जाता है, वह अपने क्रोध का निवारण कर देता है, अहम् को मारकर वह सत्य में समाहित हो जाता है॥ १५॥

3सत्यस्वरूप परमेश्वर की महिमा भी सच्ची है और

4गुरु की कृपा से किसी विरले ने ही बड़ाई प्राप्त की है।

5नानक तो एक यही विनती करता है कि वह नाम द्वारा प्रभु में समाया रहे॥ १६॥ १॥ २३॥

6मारू महला ३॥

7हे भक्तवत्सल ! कृपा करके भक्तों को अपने साथ मिला लो,

8चूंकि भक्तजन लगन लगाकर सदा तेरी ही प्रशंसा करते रहते हैं।

9हे सृष्टिकर्ता ! तेरी शरण में ही उनका उद्वार हुआ है और तूने स्वयं ही उन्हें मिलाया है॥ १॥

10पूर्ण गुरु-शब्द द्वारा की हुई भक्ति ही तुझे सुन्दर लगती है,

11यही तेरे मन को भा गई है और इससे उनके मन में सच्चा सुख उत्पन्न होता है।

12जिसने सच्चे परमेश्वर से चित्त लगाया है, उसका मन-तन सच्ची भक्ति में ही लीन रहता है॥ २॥

13मनुष्य सदा अहम् की अग्नि में जलता रहता है,

14लेकिन यदि प्रभु-कृपा हो जाए तो पूर्ण गुरु से भेंट हो जाती है।

15शब्द-गुरु मन में से अज्ञान को दूर कर देता है और सतगुरु से सुख पाता है॥ ३॥

16अन्धा मनमुखी जीव अन्धे कर्म ही करता है,

17फलस्वरूप योनि चक्र में भटकता हुआ अनेक कष्ट सहन करता है।

18मौत का फदा वह कभी काट नहीं पाता और अन्तकाल बहुत दुख भोगता है॥ ४॥

19आवागमन का निवारण शब्द-गुरु से होता है,

20जो सत्य-नाम को अपने हृदय में धारण करता है,

21वह गुरु के शब्द द्वारा मन को मार कर अपना अभिमान मिटाकर सत्य में विलीन हो जाता है॥ ५॥

22जन्म-मरण के चक्र में पड़ी हुई दुनिया ख्वार होती रहती है,

23सतगुरु के बिना कोई भी स्थिर नहीं हो सकता।

24जिसके अन्तर्मन में शब्द ब्रह्म ज्योति का वास हो गया है, उसे ही सुख मिला है और उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो गई है। ६॥

25काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार रूपी पंच दूत विकारों का ख्याल करते हैं,

26यह सब मोह-माया का ही प्रसार है।

27यदि कोई सतगुरु की सेवा करे तो वह इन बन्धनों से मुक्त हो जाता है और पांच दूतों को वशीभूत कर लेता है॥ ७॥

28गुरु के बिना मोह का अन्धेरा बना रहता है और

29जीव पुनः पुनः मोह के समुद्र में डूबता रहता है।

30यदि सतगुरु से भेंट हो जाए तो वह सत्य ही दृढ़ करवाता है और तब जीव के मन को सत्य-नाम ही प्यारा लगता है॥८॥

31ईश्वर का द्वार एवं दरबार दोनों ही सत्य हैं।

32शब्द से प्रेम करने वाले परमात्मा की उपासना करते हैं।

33सच्चे परमात्मा का गुणगान करते हुए मन में सच्ची अनहद ध्वनि गूंजने लगती है और इस प्रकार जीव सत्य में विलीन हो जाता है॥ ९॥

34यदि कोई शरीर रूपी घर में दसम द्वार रूपी घर को पा लेता है तो

35वह गुरु के शब्द द्वारा सहजवस्था में लीन हो जाता है।

36वहाँ उसे कोई शोक अथवा वियोग प्रभावित नहीं करता और वह सहज ही सहजावस्था में लीन रहता है॥ १०॥

37द्वैतभाव में दुष्टता का वास होता है और

38इस तरह के व्यक्ति मोह-लालसा में भटकते रहते हैं।

39वे कुसंगति में बैठकर सदा दुख पाते हैं और दुखों में घिरे रहते हैं॥ ११॥

40सतिगुरु के बिना सुसंगति प्राप्त नहीं होती और

41शब्द-गुरु के बिना कोई संसार-सागर से पार नहीं हो सकता।

42जो व्यक्ति सहजावस्था में दिन-रात प्रभु के गुण गाता रहता है,उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है।॥ १२॥

43यह मानव-शरीर एक वृक्ष है, जिसमें मन रूपी पक्षी का निवास है।

44वह नामामृत का दाना चुगता है और शब्द-गुरु में लीन रहता है।

45अब वह बिल्कुल भी इधर-उधर नहीं उड़ता और अपने सच्चे घर में वास पा लेता है॥ १३॥

46जो अपने शरीर को विकारों की ओर से शुद्ध करके शब्द का चिंतन करता है,

47वह मोह की ठग-बूटी सेवन नहीं करता और भ्रम को निवृत्त कर देता है।

48सुखदाता परमेश्वर स्वयं ही कृपा करके मिला लेता है॥ १४॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं