सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1067 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1वह स्वयं ही शब्द-गुरु से मिलाता है और

2शब्द-गुरु मन के अहं को मिटा देता है।

3हे नानक ! परमात्मा के नाम से ही बड़ाई मिलती है और नाम से ही सुख हासिल होता है।॥१६॥ ८॥ २२॥

4मारू महला ३॥

5मन-वाणी से परे परमपिता परमेश्वर बे-परवाह है,

6वह स्वयं ही मेहरवान, अगम्य एवं अथाह है।

7उस तक कोई पहुँच नहीं सकता और शब्द-गुरु द्वारा मिला लेता है॥ १॥

8हे परमेश्वर ! जो तुझे भाते हैं, वही तेरी उपासना करते हैं और

9गुरु के शब्द द्वारा सत्य में विलीन रहते हैं।

10वे नित्य तेरा गुणगान करते हैं और उनकी जिव्हा को हरि-नाम रस ही भाया है॥ २॥

11जो शब्द-गुरु द्वारा अहम् को मार लेते हैं,

12वे अपने मरण को सँवार लेते हैं और भगवान के गुणों को हृदय में धारण कर लेते हैं।

13प्रभु -चरणों में लगकर उनका जन्म सफल हो गया है और द्वैतभाव मिट गया है॥ ३॥

14ईश्वर स्वयं ही उन्हें अपने साथ मिला लेता है,

15जो व्यक्ति गुरु के शब्द द्वारा अपने अहम् को दूर कर देते हैं,

16ऐसे व्यक्ति सदा परमात्मा कां भक्ति में लीन रहते हैं और इस जगत् में उन्होंने लाभ प्राप्त किया है॥ ४॥

17हे प्रभु ! मैं तेरे गुण वर्णन करना चाहता हूँ लेकिन मुझ से वर्णन नहीं किए जा सकते।

18तेरा कोई अन्त नहीं है, न ही कोई आर पार है और किसी ने भी तेरी सही कीमत नहीं आँकी ।

19जब सुखदाता परमेश्वर स्वयं ही दया करता है तो जीव गुणनिधान के गुणों में लीन हो जाता है॥ ५॥

20इस जगत् में चारों ओर मोह ही फैला हुआ है और

21अज्ञानी मनमुखी जीव अज्ञानता के अन्धकार में ही भटकता रहता है।

22संसार के धंधों में भागदौड़ करते हुए उसने अपना जन्म व्यर्थ गंवा लिया है और नाम के बिना दुख ही पाया है॥ ६॥

23अगर प्रभु-कृपा हो जाए तो वह सतगुरु को पा लेता है और

24वह शब्द गुरु द्वारा अपने अहम् की मैल को साफ कर लेता है।

25उसका मन निर्मल हो जाता है, जिसमें ज्ञान-रत्न का आलोक हो जाता है और अज्ञानता का अंधेरा मिट जाता है॥ ७॥

26तेरे नाम अनेक हैं और किसी ने भी उनकी सही कीमत नहीं आँकी ।

27तेरे सत्य-नाम को अपने हृदय में बसा लिया है।

28हे प्रभु ! तेरी सही कीमत कौन कर सकता है, तू स्वयं ही परमानंद में समाया हुआ है।॥ ८॥

29तेरा अमूल्य नाम अगम्य-अपार है और

30इसे तोलने वाला कोई नहीं हुआ है।

31तू खुद ही इसे तोलता है और जीवों से तौल कर तुलवाता है, तूने शब्द-गुरु से मिलाकर उनसे नाम को तुलवाया है॥ ९॥

32सेवक तेरी सेवा-भक्ति में रत होकर तुझसे ही प्रार्थना करते हैं और

33तू उन्हें मिलाकर अपने पास बिठाता है।

34सब जीवों को सुख देने वाला दाता केवल तू ही है और किसी विरले ने पूर्ण भाग्य से ही तेरा ध्यान किया है॥ १०॥

35यदि कोई सत्य का आचरण अपनाता है तो उसे तपश्चर्या, सदाचार एवं संयम इत्यादि शुभ कर्मों का फल मिल जाता है।

36यदि कोई परमात्मा के गुण गाता है तो उसका मन निर्मल हो जाता है और

37माया रूपी विष में विचरन करते हुए ही उसे नामामृत प्राप्त हो जाता है, मेरे परमेश्वर को यही भाया है॥ ११॥

38जिसे वह ज्ञान देता है, वही बूझता है।

39वह परमात्मा के गुण गाता है, जिससे उसके मन में ज्ञान हो जाता है।

40उसने अहम् एवं ममता को रोक कर सहज ही सत्य को पा लिया है॥ १२॥

41कितने ही बदकिस्मत लोग भटकते रहते है,

42वे बार बार जन्मते मरते रहते है किन्तु उनका आवागमन ख़त्म नहीं होता।

43विषय-विकारों में लीन रहने वाला जीव विकारों का ही आचरण करता है और उसने जीवन में कभी सुख प्राप्त नहीं किया॥ १३॥

44वेष धारण करने वाला बहुरूपिया अनेक वेष बनाता रहता है लेकिन

45शब्द-गुरु के बिना किसी का भी अहम् नहीं मिटा।

46यदि वह जीवित ही पापों की तरफ से मर जाए तो मुक्ति पा लेता है और सत्य-नाम में विलीन हो जाता है॥ १४॥

47अज्ञान एवं तृष्णाग्नि इस तन को जलाते रहते हैं,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं