सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1065 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ, जो परमात्मा को याद करते हैं।

2शब्द-गुरु द्वारा ही उनका मिलन हुआ है।

3मैंने उनकी चरण-धूलि अपने मुख एवं माथे लगा ली है और सत्संगति में बैठकर भगवान के गुण गाता रहता हूँ॥ २॥

4मैं भगवान के गुण तभी गाता हूँ, यदि मेरे प्रभु को मंजूर है।

5अन्तर्मन में हरि का नाम बस गया है और शब्द से जीवन सुन्दर बन गया है।

6चारों दिशाओं में गुरु वाणी की कीर्ति सुनी जा रही है और सत्य-नाम में ही समा रहा हूँ॥ ३॥

7वही मनुष्य सच्चा है, जो अन्तर्मन में सत्य की खोज करता है। गुरु के शब्द को पढ़ने, सुनने, गाने वाले को परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि से आनंदित कर देता है।

8जो शब्द-गुरु द्वारा ज्ञान का सुरमा नेत्रों में डालता है, कृपानिधान कृपा कर संग मिला लेता है॥ ४॥

9अहोभाग्य से यह मानव-शरीर प्राप्त हुआ है और

10इस मानव-जन्म में शब्द से ही चित्त लगाया है।

11शब्द के बिना सब ओर अंधेरा ही अंधेरा है और किसी गुरुमुख को ही प्रभु यह रहस्य बताता है॥ ५॥

12कुछ जीवों ने अपना जन्म व्यर्थ गँवा लिया है, जगत् में किस कार्य आए हैं।

13मनमुखी द्वैतभाव में ही तल्लीन हैं।

14तदन्तर यह सुनहरी अवसर पुनः हाथ में नहीं आने वाला, पैर फिसलने पर गिर कर मनुष्य पछताता ही है॥ ६॥

15गुरु के शब्द द्वारा जिसका शरीर पवित्र हो जाता है,

16उस में ही गुणों का गहरा सागर परमेश्वर आ बसता है।

17फिर वह सर्वत्र परम-सत्य को ही देखता है और सत्य की महिमा को सुनकर उसे अपने मन में बसाता है॥ ७॥

18वह गुरु के शब्द द्वारा अहम् एवं कर्मों की गणना को निवृत्त कर देता है।

19परमात्मा को अपने हृदय में बसाकर रखो,

20जो गुरु के शब्द द्वारा सदा स्तुतिगान करता है, वह प्रभु को मिलकर सुख पाता है॥ ८॥

21परमात्मा को वही याद करता है, जिसे वह स्वयं याद करवाता है और

22गुरु के शब्द द्वारा वह मन में आकर बस जाता है।

23वह स्वयं ही सब देखता है, स्वयं ही बूझता है और अपने आप में ही समाया रहता है॥ ९॥

24जिसने मन में नाम-रूपी वस्तु डाली है, वही इसके भेद को जानता है।

25गुरु के शब्द द्वारा मनुष्य अपने आप को पहचान लेता है।

26जो अपने आप को पहचानता है, वही व्यक्ति निर्मल है और अन्यों को गुरु की वाणी एवं शब्द ही सुनाता है॥ १०॥

27यह शरीर तो ही पवित्र है,

28यदि शब्द-गुरु द्वारा गुणों के गहन सागर परमात्मा का स्मरण करता है।

29वह प्रतिदिन प्रभु के गुणगान में ही लीन रहता है और गुणों का कथन करके गुणीनिधान में ही समा जाता है॥ ११॥

30यह समूचा शरीर मूल माया-रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण से बना हुआ है और

31द्वैतभाव के कारण भ्रम में भटका हुआ है।

32यह परमात्मा को याद नहीं करता, अतः सदा दुख पाता है। वास्तव में परमात्मा का स्मरण किए बिना दुःख ही नसीब होता है॥ १२॥

33जो व्यक्ति सतगुरु की सेवा करता है, वही परवान होता है।

34उसका शरीर एवं आत्मा निर्मल होकर सच्चे प्रभु के द्वार से परिचित हो जाते हैं।

35वह परमात्मा की उपासना करता है, परमात्मा को मन में बसता है और उसका गुणगान करता हुआ सुन्दर लगता है॥ १३॥

36भाग्य के बिना गुरु की सेवा नहीं की जा सकती और

37भूले हुए मनमुखी जीव रोते हुए ही दम तोड़ देते हैं।

38जिन पर गुरु की कृपा-दृष्टि हो जाती है, उन्हें प्रभु स्वयं ही मिला लेता है॥ १४॥

39यह मानव-शरीर एक किला है, जिसमें पक्के बाज़ार बने हुए हैं,

40जहाँ से गुरुमुख नाम रूपी वस्तु खरीद लेता है और नाम-स्मरण करता है।

41वह दिन-रात हरि-नाम का भजन करके उत्तम पदवी (तुरीयावस्था) पा लेता है॥ १५॥

42सच्चा परमेश्वर ही सुख प्रदाता है और

43इसकी पहचान पूर्ण गुरु के शब्द द्वारा ही होती है।

44हे नानक ! परमात्मा के नाम का स्तुतिगान कर पूर्ण खुशनसीब ही उसे पाता है॥ १६॥ ७॥ २१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं