सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1064 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1जिसे तेरी रज़ा स्वीकार है, वे तुझ में ही विलीन हो जाते हैं।

2ईश्वरेच्छा में बड़ा बड़प्पन है, लेकिन तू किसी विरले से ही अपनी रज़ा मनवाता है॥ ३॥

3जब परमात्मा को मंजूर हो तो वह गुरु से मिला देता है।

4गुरु के सान्निध्य में नाम-पदार्थ प्राप्त होता है।

5हे परमेश्वर ! तूने अपनी इच्छा में समस्त सृष्टि उत्पन्न की है। उस जीव को ही तेरी इच्छा सहर्ष स्वीकार है, जिसे तूं स्वयं इच्छा मानने की शक्ति देता है॥ ४॥

6अन्धा मनमुखी जीव चतुराई करता है,

7वह ईश्वरेच्छा को नहीं मानता, इसलिए बहुत दुखी होता है।

8वह भ्रम में भटक कर आवागमन में पड़ा रहता है और अपने सच्चे घर को कभी प्राप्त नहीं करता॥ ५॥

9अगर सतिगुरु से मिलन हो जाए तो ही बड़ाई प्रदान करता है,

10सतिगुरु की सेवा करना तो ईश्वर के दरबार से ही फुरमान है।

11यदि सतिगुरु की सेवा की जाए तो ही हरि-नाम प्राप्त होता है और नाम से ही सुख मिलता है॥ ६॥

12समूचा जगत्-प्रसार नाम से उत्पन्न होता है और नाम से ही नष्ट हो जाता है।

13गुरु की कृपा से ही मन-तन नाम-रस में भीगता है।

14जब रसना नाम का स्तुतिगान करके नाम-रस में भीगती है तो उस नाम-रस से हरि-रस मिलता है॥ ७॥

15कोई विरला पुरुष ही शरीर रूपी घर में दसम द्वार को पाता है और

16गुरु के शब्द द्वारा सत्य में चित लगाता है।

17गुरु जिसे सत्य-नाम देता है, वही सत्य को प्राप्त करता है और वह सत्य द्वारा ही परम-सत्य से मिला देता है॥ ८॥

18नाम को भुलाकर जीव ने मन-तन में दुख ही पाया है और

19माया-मोह में लगकर सब रोग ही कमाया है।

20नाम के बिना उसका मन-तन कुष्ठी हो गया है, अतः वह नरक में ही वास पाता है॥ ९॥

21जो प्रभु-नाम में लीन हैं, उनका ही शरीर निर्मल है।

22उनकी निर्मल आत्मा प्रभु-प्रेम द्वारा सदा सुखी रहती है।

23नाम का स्तुतिगान करके उसने सदा सुख पाया है और वह अपने सच्चे घर में वास पा लेता है॥ १०॥

24सभी जीव जगत् में भिन्न-भिन्न व्यापार करते हैं लेकिन

25हरि-नाम के बिना संसार में घाटा ही पड़ता है।

26प्रत्येक जीव नग्न अर्थात् खाली हाथ ही आया है और नग्न (खाली) ही चला जाएगा। प्रभु नाम के बिना उसे दुख ही मिलता है।११॥

27जिसे परमात्मा नाम देता है, वही उसे पाता है।

28गुरु के शब्द द्वारा वह प्रभु को मन में बसा लेता है।

29गुरु की कृपा से जिसके हृदय में हरि-नाम बस गया है, वह अन्तर्मन में नाम का ही ध्यान करता रहता है।॥ १२॥

30जितनी भी समूची सृष्टि पैदा हुई है, वह नाम को पाने की आकांक्षी है।

31लेकिन नाम उन्हें ही मिलता है, जिनके पूर्व जन्म के किए कर्म शुभ थे।

32जिन्होंने नाम पा लिया है, वे खुशनसीब हैं और शब्द-गुरु द्वारा प्रभु ने उन्हें मिला लिया है॥ १३॥

33मानव शरीर एक बहुत बड़ा किला है,

34जिसमें बैठकर प्रभु विचार करता है।

35वह सच्चा न्याय एवं सच्चा व्यापार करता है और वह निश्चल वास पाता है॥ १४॥

36शरीर रूपी किले में मन, बुद्धि इत्यादि सुन्दर घर बने हुए हैं और किसी विरले गुरुमुख ने ही यह स्थान पाया है।

37जो सच्चे परमात्मा की प्रशंसा करता है,

38उस परम-सत्य को मन में बसा लेता है, इस प्रकार प्रभु अंत तक उसका साथ निभाता है॥ १५॥

39मेरे परमेश्वर ने एक ऐसी संरचना की है कि

40शरीर में ही सब वस्तुएँ डाल दी हैं।

41हे नानक ! प्रभु-रंग में लीन रहने वाले नाम का व्यापार करते हैं और कोई गुरुमुख ही नाम (का रहस्य) प्राप्त करता है॥१६॥६॥ २०॥

42मारू महला ३॥

43शब्द का चिंतन करने से शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है और

44इसमें ईश्वर वास करता है, जिसका कोई अन्त एवं आर-पार नहीं पाया जा सकता।

45सच्ची वाणी द्वारा नित्य ईश्वर की आराधना करो, शब्द द्वारा प्रभु जीव को अपने संग मिला लेता है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं