गुरु ग्रंथ साहिब 1063 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1सतिगुरु की सेवा करने से सहज ही आनंद मिलता है और
2हृदय में प्रभु आकर बस जाता है।
3तब जीव सहज ही दिन-रात भक्ति करता रहता है और प्रभु स्वयं ही भक्ति करवाता है॥ ४॥
4जो सतिगुरु से बिछुड़ गए हैं, उन्होंने दुख ही पाया है।
5उन्हें प्रतिदिन मार पड़ती है और सब दुख उन्हें घेर लेते हैं।
6उनका तिरस्कार होता है, उन्हें सच्चा स्थान नहीं मिलता और ऐसे व्यक्ति दुखों में और दुखी होते हैं।॥ ५॥
7सतगुरु की सेवा में तल्लीन रहने वाले भाग्यवान् हैं।
8सहज-स्वभाव पूर्ण निष्ठा से उनकी परमात्मा में लगन लगी रहती है।
9वे सदा सत्य का आचरण अपनाते हैं और उन्हें परमात्मा से मिला देता है॥ ६॥
10सच्चा प्रभु जिसे सच्चा-नाम देता है, वही इसे प्राप्त करता है।
11जिसके मन में सत्य बस जाता है, उसका भ्रम दूर हो जाता है।
12परमात्मा स्वयं ही सत्य-नाम का प्रदाता है, जिसे वह देता है, वही सत्य प्राप्त करता है॥ ७॥
13वह कर्ता-प्रभु स्वयं ही सबका (स्वामी) है,
14जिसे वह स्वयं सूझ प्रदान करता है, ऐसा कोई विरला पुरुष ही तथ्य को बूझता है।
15वह स्वयं ही कृपा करके बड़ाई प्रदान करता है और अपने साथ मिला लेता है॥ ८॥
16समूचा जीवन तो अभिमान करते हुए जीव ने गंवा लिया और
17आगे भी उसका माया का मोह दूर नहीं होता।
18आगे परलोक में जब यमराज किए कर्मों का हिसाब लेता है तो दण्ड के रूप में कोल्हू में यूं पीसता है जैसे तेली तिलों को पीसता है॥ ९॥
19पूर्ण भाग्य से ही गुरु की सेवा होती है।
20जब प्रभु अपनी कृपा करता है तब ही कोई सेवा करता है।
21यमराज भी उसके निकट नहीं आता और वह सच्चे घर में सुख प्राप्त करता है॥ १०॥
22हे निरंकार ! उन्होंने ही सुख पाया है, जो तुझे प्रिय हैं।
23पूर्ण भाग्य से ही तूने उनको गुरु की सेवा में लगाया है।
24सब बड़ाई तेरे हाथ में है, जिसे तू देता है, वही इसे पाता है॥ ११॥
25मन में ज्ञान का प्रकाश गुरु से ही प्राप्त होता है और
26वह मन में नाम पदार्थ बसा देता है।
27ज्ञान-रत्न से हृदय में सदा प्रकाश होता है और अज्ञानता का अंधेरा मिट जाता है॥ १२॥
28अज्ञानी अंधे द्वैतभाव में लिप्त रहते हैं,
29ऐसे अभागे तो पानी के बिना ही डूबकर मर जाते हैं।
30जगत से चलते वक्त उन्हें अपना सच्चा घर द्वार नजर नहीं आता और वे यम के द्वार पर बंधे हुए दुख ही भोगते हैं।॥ १३॥
31सतिगुरु की सेवा किए बिना किसी को मुक्ति प्राप्त नहीं होती,
32चाहे इस संदर्भ में किसी ज्ञानी-ध्यानी से जाकर पूछ लो।
33जो सतिगुरु की सेवा करता है, उसे ही कीर्ति प्राप्त होती है और सच्चे दर पर शोभा का पात्र बनता है॥ १४॥
34जो सतिगुरु की सेवा करता है, ईश्वर स्वयं ही उसे मिला लेता है।
35ऐसा व्यक्ति ममता को नाश करके सत्य में ही लगन लगाता है।
36वह व्यापारी सदा सत्य का व्यापार करता रहता है और नाम रूपी लाभ हासिल करता है॥ १५॥
37कर्ता-प्रभु स्वयं ही करता और करवाता है।
38जो शब्द द्वारा मोह-माया की ओर से मर जाता है, वही मुक्त होता है।
39हे नानक ! जिसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है, वह नाम द्वारा नाम का ही मनन करता रहता है।१६॥ ५॥ १६॥
40मारू महला ३॥
41जो तूने करना है, वही भाग्य में पाया है।
42हे ईश्वर ! कोई विरला पुरुष ही तेरी रज़ा में चला है।
43जो तेरी रज़ा को मानता है, वही सुख पाता है। सत्य तो यही है कि प्रभु-रज़ा में ही सुख मिलता है॥ १॥
44गुरुमुख को तेरी रज़ा ही भाती है।
45वह सच्चा आचरण अपनाकर सुख ही सुख पाता है।
46बहुत सारे जिज्ञासु तेरी रज़ा को मानना चाहते हैं परन्तु तू स्वयं ही अपनी रज़ा मनवाता है॥ २॥
47जो तेरी रज़ा को सहर्ष मानते हैं, वे तुझ में ही आकर मिल जाते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं