सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1062 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1जो ईश्वर करता है, वह निश्चय होता है।

2मनुष्य गुरु के शब्द द्वारा अभिमान को दूर कर देता है।

3गुरु-कृपा से जिस किसी को बड़ाई देता है, वह हरि-नाम का ही ध्यान करता है॥ ५॥

4गुरु की सेवा करने जितना बड़ा अन्य कोई लाभ नहीं।

5जिसके मन में नाम बस जाता है, वह केवल नाम की ही स्तुति करता है।

6केवल नाम ही सदा सुख देने वाला है और वह नाम रूपी लाभ ही प्राप्त करता है।॥ ६॥

7नाम के बिना संसार में सब दुख ही दुख हैं।

8जो मनुष्य अनेक धर्म-कर्म करता है, उसके मन के विकार बढ़ जाते हैं।

9हरि-नाम की सेवा किए बिना कैसे सुख प्राप्त हो सकता है नाम के बिना दुख ही मिलता है॥ ७॥

10ईश्वर स्वयं ही करता है और स्वयं ही जीव से कर्म करवाता है।

11गुरु की कृपा से किसी विरले को ही यह भेद समझाता है।

12जो गुरमुख होता है, वह अपने तमाम बन्धन तोड़ देता है और मुक्ति के घर में वास पा लेता है।८॥

13जो कमों का हिसाब-किताब करता है, वह संसार में जलता रहता है।

14उसके विकार एवं संशय बिल्कुल दूर नहीं होते।

15जो गुरुमुख होता है, उसका हिसाब-किताब समाप्त हो जाता है और वह परम-सत्य में ही विलीन हो जाता है॥ ९॥

16यदि प्रभु सत्य-नाम दे तो ही कोई प्राप्त करता है और

17गुरु की कृपा से प्रगट हो जाता है।

18सच्चे प्रभु-नाम की स्तुति करता हुआ जिज्ञासु उसके रंग में ही रत रहता है और गुरु की कृपा से सुख पाता है॥ १०॥

19परमात्मा का प्यारा नाम ही जप, तप एवं संयम है और

20वह सब पापों को काटने वाला है।

21हरि के नाम से तन-मन शीतल हो जाता है और वह सहज ही सहजावस्था में समा जाता है।॥११॥

22जिसके अन्तर्मन में लोभ है, वह मैले मन को और मलिन कर लेता है।

23वह मलिन कर्म करके दुख ही प्राप्त करता है।

24वह झूठ का व्यापार करता है और झूठ बोलकर दुख प्राप्त करता है॥ १२॥

25जो कोई निर्मल वाणी को मन में बसाता है,

26गुरु की कृपा से उसका संशय दूर हो जाता है।

27वह दिन-रात गुरु की रज़ानुसार चलता है और नाम-स्मरण करके सुख प्राप्त करता है॥ १३॥

28वह सच्चा परमेश्वर स्वयं ही स्रष्टा है और

29उत्पन्न एवं नष्ट करने वाला भी वह स्वयं ही है।

30जो गुरुमुख होता है, वह सदा परमात्मा का ध्यान करता है और सत्य से मिलकर सुख प्राप्त करता है॥ १४॥

31यदि कोई अनेक यत्न भी करे तो भी काम-इन्द्रिय उसके वश में नहीं होती एवं

32प्रत्येक जीव काम-क्रोध में जल रहा है।

33यदि कोई सतिगुरु की सेवा करे तो ही मन उसके वश में आता है और मन को मारने से ही आत्म-ज्योति परम-ज्योति में विलीन होती है॥ १५॥

34हे परमात्मा ! जीवों के मन में मेरा-तेरा की भावना तूने ही पैदा की है और

35सभी जीव तेरी ही रचना है।

36हे नानक ! तू सदा परमात्मा का नाम-स्मरण कर, गुरु-उपदेश द्वारा वह मन में बसता है॥ १६॥ ४॥ १८॥

37मारू महला ३॥

38परमात्मा संसार का दाता अगम्य-अथाह है,

39वह बेपरवाह है और उसे तिल भर भी कोई लोभ नहीं।

40कोई भी उस तक पहुँच नहीं सकता, वह स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥ १॥

41जो कुछ वह करता है, वह निश्चय होता है।

42उसके सिवा अन्य कोई भी प्रदाता नहीं है,

43जिसे वह नाम-दान करता है, वही पाता है और वह शब्द-गुरु द्वारा साथ मिलाता है॥ २॥

44हे प्रभु ! चौदह लोक तेरे बाज़ार हैं और

45सतिगुरु ने ये हृदय में ही दिखा दिए हैं।

46जो नाम का व्यापारी होता है, कोई विरला ही गुरु के शब्द द्वारा नाम को पा लेता है॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं